जन्मदिन*------सिंधु सनातनी*

जन्मदिन
*------सिंधु सनातनी*
मैं आज बहुत खुश था। ऑफिस गया तो कलिग्स ने सरप्राइज़ पार्टी रखी थी। दिन भर वाट्‌सएप और फोन पर बधाई मिलती रही। मेरे बेटे और पत्नी ने रात में ही बधाई दे दी थी। दिन भर बधाईयों का तांता लगा रहा। पर मेरी नज़रें कोई और चेहरा ढूंढ रही थी। कान उस आवाज को सुनना चाह रहा था जिनकी लोरी और डाँट सुनसुन कर मैं इतने सालो का हुआ हूँ। वैसे तो मेरा कोई जन्मदिन घर में मनाया नहीं गया था और ना ही कोई मुझे विश ही करता था । शादी के बाद मेरी पत्नी ने मेरा जन्मदिन सेलिब्रेट करने का सिलसिला शुरू किया था। 
ऐसा नहीं है कि घर में किसी का जन्मदिन मनाया ही नहीं  जाता । मेरे बड़े भाई का जन्मदिन सबको याद रहता । घर में पकवान बनता । माँ मंदिर जाती,  मंगलकामना करती लेकिन इसके पीछे का कारण भी शायद मैं ही था ।  मैं पढाई-लिखाई में भैया जैसा होशियार नहीं था । भैया हमेशा से क्लास में अव्वल आता था । पढ़ाई  पूरी होने के बाद वह विदेश की एक कंपनी में बड़े पोस्ट पर अप्वांइट होकर सपरिवार चले गएं । मुझे भी  एक छोटी नौकरी मिली, फिर धीरे-धीरे प्रमोशन होते-होते किसी तरह मैनेजर की पोस्ट तक पहुँचा था । घर की पूरी जिम्मेदारी मुझे दी गई थी क्योंकि मैं कोई बड़ी कंपनी में नहीं था और घरवालों के हिसाब से मैं नकारा और फ्री था। बड़े भाई का हर दूसरे-तीसरे दिन फोन आता रहता। बड़ी-बड़ी हिदायतें मिलती रहती कि मम्मी-पापा का अच्छे से ध्यान रखना। वे ही धरती पर हमारे भगवान हैं। मेरे माता-पिता बहुत खुश होते थें कि उनका बड़ा बेटा कितना लायक है? हमेशा माता-पिता को याद करता है। अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग है। पापा तो उन्हें घर का भगवान कहते हैं। पापा के अनुसार भैया ने कुल का नाम रौशन किया था। चूंकि भैया कुल दीपक  थें इसलिए कुल लक्ष्मी का गौरव भी भाभी के पास था। सालो से घरभर की सेवा करने के बाद भी मेरी पत्नी को डाँट और ताने मिलते तो वह आकर अपना सारा गुस्सा मुझ पर उतार देती। मैं इतना ही कहकर रह जाता कि उन्होने मुझे जन्म दिया है। मेरी जान भी ले लेंगे तो मैं उफ नहीं करूँगा। मैं तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकता हूं लेकिन वे लोग मेरी जान से बढ़कर हैं। तुम्हें नहीं जमता तो तुम अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो। वह थकहार कर फिर अगले दिन काम में लग जाती। 
मम्मी-पापा भैया के जाने के बाद मुझसे थोड़ा ठीक-ठाक से बात करने लगे थें तो मेरे मन में भी उम्मीद जाग गई थी कि शायद उन्हें मेरा यह जन्मदिन याद हो और वे मुझे विश करेंगे।
मम्मी मामा के घर गई थीं। उनका सुबह ही सुबह फोन आया कि पापा  कि तबीयत ठीक नहीं है तो उन्हें दवा दिलवा दो। मैं  फैमिली डॉक्टर को लेकर आया। पापा का इलाज करवाकर, उनको पोछ-पाछकर कपड़ा पहना दिया। डॉक्टर साहब ने बड़ी तारीफ की  कि मेहता साहब! आप बहुत खुशनशील हैं। इतना लायक बेटा है।  बहुत सेवा भाव रखता है।
पापा –“क्यों नहीं? डॉक्टर साहब!  किस दिन के लिए पैदा किया  हूँ। पाल-पोसकर बड़ा किया हूँ। मेरे दोनों बेटे लायक हैं। बड़ा वाला भी बड़ा ध्यान रखता है।”
डॉक्टर- “क्यों नहीं? सब आप के अच्छे संस्कार है।”
 मैं प्रशंसा सुनकर फूलकर कुप्पा हो गया। प्रसन्न चित्त तैयार होकर ऑफिस जाने की तैयारी में था।
पापा ने आवाज लगाई। मम्मी का फोन है। कह रहीं हैं कि आज उनके भतीजे के बेटे का जन्मदिन है।  वहाँ पार्टी है, इसलिए आज भी घर नहीं आ पाएँगी। उनका खाना मत बनाना। 
मेरे मन में एक बार फिर  उमीद जगी कि जन्मदिन की पार्टी सुनकर शायद  मम्मी को मेरा जन्मदिन याद आ जाए लेकिन उन्हें याद नहीं आया। पापा मम्मी से बोल रहे थें, “तुम चिंता मत करो।  सभी मेरा ख्याल रख रहे है। बेटा पैदा किया हूँ। कोई मजाक नहीं है। मम्मी ने फिर भी आश्वस्त होने  के लिए मुझे फोन  करके बोला, “राहुल! दोपहर में पापा को टाइम पर दवा दे देना। थोडा सेवा-टहल अच्छे से कर देना। अपनी पत्नी के भरोसे मत रहना आखिर तुम्हें पैदा किए है।  ममता तो पराए घर से आई है। माता-पिता से बड़ा कोई भगवान नहीं होता।”
राहुल- ”यह भी कहने की बात है मम्मी। मैं सब कुछ कर दूंगा।”
 मम्मी ने भैया को पापा की तबीयत के बारे में बताया था। पापा का खैरियत जान‌ने के लिए भैया का भी फोन आ गया। उन्होंने भी मुझे अच्छे से समझाया कि वे यहाँ नहीं है तो मुझे बहुत अच्छे से पापा का ध्यान रखना होगा। कल छुट्टी लेकर पापा का फुल बॉडी चेकअप याद से करवा देना। मैंने हामी भरी और फोन कट गया।
पापा की तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए रात में भी सादा भोजन ही बना। मैं तो बाहर ही खाकर आया था क्योंकि ऑफिस में मेरे जन्मदिन की पार्टी थी। बेटा उदास था और पत्नी आग बबूला थी क्योंकि उन दोनों को मेरा बर्थडे पार्टी मनानी थी और मैंने पापा की तबीयत की वजह से मना कर दिया।  
 लेटते ही पत्नी ने प्रश्न दागा –“तुम्हारे परिवार से किस-किस ने विश किया? सबका अपने मतलब के लिए फोन आया लेकिन किसी को आपका जन्मदिन याद नहीं रहा।”
 राहुल –“दुआएं दिल से मिलती है ऊपरी दिखाया से नहीं।”
ममता -“हाँ, मैं देख रही थी कैसे बार-बार फोन की ओर नजर जा रही थी कि इस बार मम्मी विश करेंगी। लेकिन अंगूर खट्‌टे हो गए ।”  (उसने व्यंग्यात्मक हँसी में बोला)
राहुल –“जन्मदिन विश नहीं किया तो क्या हुआ जन्म तो दिया है ना ? अभी उन लोगों की उम्र भी हो गई है। भूल गए होंगे।” 
ममता –“हाँ, जन्म तो दिया लेकिन किस दिन दिया है कभी यह याद नहीं रहता। पता नहीं जन्म दिया भी है या कहीं से उठा लाएं है और उन्हें खुद ही पता नहीं कि आपका जन्मदिन कब है? अभी पिछले महीने ही भैया को कैसे सुबह-सुबह ही विडियो कॉल पर दोनों जन बधाई दे रहे थे। अभी देखना चार दिन बाद उनकी याददाश्त फिर दुरुस्त हो जाएंगी।”
मैं बात समझ नहीं पाया। वह मुँह फेरकर सो चुकी थी और मैं सोच रहा था कि मेरे धरती के भगवान मुझे भूल क्यों जाते हैं?
ठीक चार दिन बाद मम्मी-पापा को भाभी को बर्थडे विश करते और आशीर्वाद देते देखा। मैं जल्दी जल्दी ऑफिस के लिए निकल गया ताकि ममता से मेरा सामना न होने पाए क्योंकि उसके सवालों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
सिंधु 'सनातनी’
मुंबई, महाराष्ट्र

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