*कैसी उगाई ये फसल है....!*

*कैसी उगाई ये फसल है....!*

नफ़ा-नुकसान जो तय हो जाते थे,
बस हाथ की ऊँगलियों पर प्यारे....
उसके लिए देखो तो.....!
अब....कागजों पर हुआ....
मनहूस स्याही का दखल है.....
सुबह का भूला हुआ तब तो....!
ख़ुद-ब-ख़ुद...शाम को वापस...
घर चला ही आता था....
आज उस निर्मल मन पर प्यारे,
दिमाग का....भरपूर दखल है....
अजीब सा दस्तूर है दुनिया का,
इसे ही लोग कह रहे हैं मित्रों....
कि.....विकास के इस दौर में....
यह मनुष्य की बढ़ती हुई अकल है..
भले सो नहीं पाते हैं,
यहाँ बिस्तरों पर लोग.....
खुद अपने ही करम से प्यारे.....!
पर मानते सभी हैं यही कि,
विरोधियों ने ही....डाल रखा....
उनकी नींद में भरपूर खलल है....
परेशान होकर यहाँ-वहाँ....!
दौड़ लगा रहे हैं सारे.....
अनजान मर्ज की दवा के लिए.....
जीने की जिजीविषा है इनकी इतनी
कि....घर में खुद के.....
दवाओं के संग....रखे हुए खरल हैं..
घर के एक कमरे में....!
कोने की जगह...मिली है उनको....
दुर्दिन तो देखो इनका....
घरवाले ही ....नहीं करते....
उनकी कोई सेवा टहल है....
इतना ही नहीं प्यारे....!
बोल जाते हैं लोग अक्सर यहाँ,
कि....करम ही रहे इनके ऐसे...
कि....नहीं नसीब में इनके.....
इनका ही बनाया मोती महल है....
देखकर इनको प्यारे...!
दिल पसीज सा जाता है....और....
सोच कर अपना बुढ़ापा....
सचमुच ही दिल जाता दहल है...
विश्वास मानो या न मानो मित्रों...
अब तो....कोई नहीं दिखता.....
मुझे तो इस जहाँ में....
जो मन-मस्तिष्क से अब धवल है...
आश्चर्य भी इस बात का है...प्यारे....
सुधारने को इनको.....यहाँ तो....
नहीं दिखती कोई पहल है....
सोचकर....हॅंसने की बात है प्यारे...
कि....विकास करते हुए हमने...
कैसी उगाई ये फसल है....!
कैसी उगाई ये फसल है....!

रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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