लघुकथा *फोटोफ्रेम* *------ सिंधु सनातनी*

लघुकथा  *फोटोफ्रेम* 

*------ सिंधु सनातनी*
जगदीश सिंह के पत्नी का जन्मदिन था। रागिनी जो उनके बड़े बेटे की पत्नी है उसी ने दिनभर लगकर  बड़े अच्छे से घर पर ही पूरी पार्टी की तैयारी की है। पनीर माखनी, विरीयानी, पुड़ी, पालक की भांजी, छोले-भटुरे, गुलाब जामुन, मॉं जी के पसंद के लौकी का हलवा। इतनी फरमाइशें पूरा करने के बाद जगदीश सिंह ने बड़े रौब से रागिनी से कहा –“बहू ! अपनी अम्मा से पूछ लेना कुछ और मन होगा उनका तो बना देना। आखिर, सास है तुम्हारी, इतना हक तो है कि अब पसंद का भोजन बैठकर खाए।“ 
रागिनी- “जी पापा जी।”
जगदीश – “हाँ, बहू हो तुम, कर्तव्य है तुम्हारा। जरा दही- बड़े भी बना देना। पसंद है उसको।”
 ये भनक गिरिजा देवी के कानों में पड़ी। वह बहू को रोकते हुए बोली, “ये मेरे नहीं अपने चक्कर में है। अब कुछ और नहीं बनाना है। मुट्ठी भर के सिर्फ परिवार के लोग है। कितना खाएंगे? तुम भी जाओ तैयार हो जाओ।”
दोनो बेटे ऑफिस से आ गये । ससुराल से बेटी भी आ गई। सभी बच्चों ने अपने-अपने गिफ्ट दिए। हँसी ठहाका चल रहा था। रागिनी भी एक साड़ी लिए एक कोने में खड़ी थी। उनके तीनों बच्चे उसे साइड करते जाते । अलग-अलग पोज में फोटो खिचाते। उसके पति ने उसे बुलाया और अपने माँ के साथ उसकी भी फोटो ली। उनके सभी बच्चे एक साथ फोटो लेने के लिए एक साथ आने लगे। रागिनी भी आगे बढ़ी। अपनी पत्नी के साथ बैठे जगदीश सिंह ने उसे हाथों से दूर होने का इशारा किया और खिलखिलाते हुए बोले,  “अब एक फोटो मेरे पूरे परिवार का।”
यह सुनते ही रागिनी सन्न रह गई। इस बात पर और किसी ने गौर किया या नहीं रागिनी को नहीं मालुम लेकिन उसके मानस पटल पर पत्थर की लीक बन गई।

उधर फोटो सेसन चलता रहा और इधर रागिनी के कानों में जगदीश सिंह की बातें उसके हृदय में शूल बनकर चुभती रही। मायके से आते समय उसके परिवार वालों ने समझाया था कि बेटी उस घर-परिवार को ही अपना घर-परिवार समझना पर यहाँ की तो तस्वीर ही कुछ और है। वह सोच रही थी, मैं कौन हूँ? यदि में  बहू हूँ तो परिवार क्यों नहीं हूँ और परिवार हूँ तो फैमिली फोटो में क्यों नहीं हूँ।

 रागिनी सबको परोसने खिलाने में लग गई। एक हफ्ते में एक बड़ा-सा फैमिली फोटोफ्रेम  बैठक की दीवार की सुंदरता बढ़ाने लगी। जो रागिनी को हर रोज याद दिलाती कि यह उसका परिवार नहीं है या वह इस परिवार की नहीं। समय के साथ धीरे-धीरे वह यह बात भूल गई। उसके दो बच्चे हो गएं। वह पूरे परिवार के साथ रच-बस गई। पूरी जिम्मेदारी को बखूबी निभाती रही।

सात साल बाद देवर की शादी हुई। घर में फिर चहल-पहल का माहौल बन गया। देवर अपनी पत्नी को लेकर चार दिन बाद  दिल्ली चला गया। एक  हफ्ते बाद बैठक की सफाई करते समय रागिनी ने देखा कि  फैमिली फोटोफ्रेम बदल गई है। एक नई फोटोफ्रेम लग गई है, जिसमें सास-ससुर, पति, ननद, ननदोई, रागिनी के दोनो बच्चे, ननद के दोनों बच्चे और सेंटर में उसके देवर और देवरानी है। कोई नहीं रहता है तो उसकी निगाहे बार-बार फोटो फ्रेम पर जाती थी। वह उसमें अपनी जगह तलाश रही थी। सात साल देकर भी उसे फैमिली फोटोफ्रेम में जगह नहीं मिली। उसकी देवरानी का मुस्कुराता चेहरा उसे ठेंगा दिखा रहा था।
 सिंधु 'सनातनी '
मुंबई, महाराष्ट्र

Comments

Popular posts from this blog

*एन के ई एस स्कूल के विद्यार्थियों ने जीता कबड्डी प्रतियोगिता*

महापालिका कर्मचाऱ्यांच्या आंदोलनातून सकारात्मक तोडगा निघाला

बृहन्मुंबई महानगर पालिका जुनी पेन्शन योजना कृती समिती द्वारे महिला दिन साजरा करण्यात आल संनि.अन्वेषक रोहिणी झगडे सम्मानित*