“प्रसाद जी हिन्दी साहित्य के जीते-जागते तीर्थ थे।” – श्री योगेन्द्र उपाध्याय “प्रसाद जी में चरैवेति की प्रेरणा भरी हुई थी।” –प्रो. शैलेन्द्रनाथ कपूर

“प्रसाद जी हिन्दी साहित्य के जीते-जागते तीर्थ थे।” – श्री योगेन्द्र उपाध्याय 
“प्रसाद जी में चरैवेति की प्रेरणा भरी हुई थी।” –प्रो. शैलेन्द्रनाथ कपूर 

“प्रसाद ने समता नहीं समरसता को महत्त्व दिया।”
“प्रसाद जी की दृष्टि मंगलवादी थी, उपयोगितावादी नहीं थी।” – प्रो. हरिशंकर मिश्र 

“प्रसाद मन विजय करें में यक़ीन करते हैं।” – प्रो. आभा ठाकुर 

“प्रसाद जी का दर्शन लोकोन्मुखी है।” – प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह 


लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित ‘महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव २०२६’ के समापन दिवस पर आज मालवीय सभागार में “स्रष्टा-द्रष्टा जयशंकर प्रसाद का साहित्य : राष्ट्र-समाज-संस्कृति” विषयक द्विदिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई एवं चित्रकला प्रदर्शनी में सम्मिलित कलाकारों को सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर आयोजन के प्रति अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित किया। उन्होंने प्रसाद जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके साहित्य का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी की रचनाएँ राष्ट्र प्रेम और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। भारतप्रेम उनकी सभी रचनाओं में झलकता है। माननीय उपाध्याय जी ने कहा कि जहाँ कई धाराओं का संगम होता वहीं संगम हो जाता है। प्रसाद जी हिन्दी साहित्य के जीते-जागते तीर्थ थे। 

तृतीय तकनीकी सत्र का विषय था– ‘जयशंकर प्रसाद का कथा साहित्य : राष्ट्र समाज-संस्कृति।’ सत्र की प्रथम वक्ता प्रो. आभा ठाकुर (हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी) ने प्रसाद और प्रेमचंद के कथा साहित्य में साम्य-वैषम्य पर अपनी बात रखते हुए गांधीवाद के प्रभाव को लक्षित किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद के यहाँ उदात्त मानवीय संवेदना उपस्थित है। प्रसाद मनुष्यता के हक़ में लिखने के हिमायती हैं। प्रसाद की कहानियाँ यथार्थ और आसपास के जीवन से करीब का रिश्ता बनाती हैं। आभा जी ने कहा कि प्रसाद मन विजय करें में यक़ीन करते हैं। प्रसाद के साहित्यिक पात्र न्यायकत्व और मनुष्यता का जयघोष करने वाले पात्र हैं। इसलिए हम इन कहानियों को अनंत काल तक याद करेंगे। 

प्रो. सूरजबहादूर थापा (हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि हम इतिहास को वर्तमान की चुनौतियों और समाधानों के लिए पढ़ते हैं। उन्होंने प्रसाद के साहित्य को संवैधानिक दृष्टि से देखे जाने की हिमायत की। उन्होंने बताया कि बौद्धिक, सामाजिक और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से प्रेरित होकर मुक्तिबोध ने प्रसाद की सभ्यता समीक्षा की है। वे कामायनी का पुनर्मूल्यांकन करते हुए आनंदवाद की जगह प्रजातंत्रवाद की स्थापना करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी की कविताओं का संसार प्रत्ययवादी है लेकिन कथा साहित्य में आने पर उनके लेखन का तेवर बदल जाता है। 

इस सत्र में डॉ. कृष्णा आर्या ने शोध पत्र का वाचन किया। संचालन डॉ. ज्ञानेन्द्र सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. हेमांशु सेन ने किया। 

चतुर्थ तकनीकी सत्र का विषय था– ‘जयशंकर प्रसाद का वैचारिक चिंतन।’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. शैलेन्द्र नाथ कपूर (पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रा. भारतीय इतिहास विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि माँ के दुग्ध की तरह मातृभाषा का भी कोई विकल्प नहीं होता। साहित्य संस्कृति की प्रयोगशाला है। प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों के नायकों पर उन्होंने महत्वपूर्ण विचार रखे। ‘अजातशत्रु’ के माध्यम से प्रसाद जी बताते हैं कि जब गणतंत्रात्मक शासन होगा तो हमें किन चीज़ों से बचना होगा, रुकावटों से हम कैसे निपट सकते हैं, यह हम उनके नाटकों से सीख सकते हैं। स्कंदगुप्त से जुड़े भितरी और जूनागढ़ के अभिलेखों का उद्धरण देते हुए उन्होंने राजा के कर्त्तव्यों पर प्रकाश डाला और उनकी वीरता को वरेण्य बताया। उन्होंने कहा कि वह व्यक्ति राष्ट्र के लिए अनुपयोगी है जिसमें राष्ट्रप्रेम का अंकुर नहीं है। माता-पिता भौतिक शरीर देते हैं, शिक्षक छात्रों को ज्ञानमय शरीर देता है। ऐतरेय ब्राह्मण का एक मंत्र ‘चरैवेति चरैवेति’ का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि प्रसाद जी में आगे बढ़ने की प्रेरणा भरी हुई थी– “अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!”

प्रो. हरिशंकर मिश्र (हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कामायनी की पंक्ति ‘ऊपर हिम था नीचे जल था एक सघन था एक तरल’ को संदर्भित करते हुए बताया कि जल शब्द ज(जन्म) और ल(लय) से मिलकर बना है। प्रसाद जी इसका साभिप्राय प्रयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि आचार्यों ने प्रसाद जी को खड़ी बोली के खाँटी कवि के रूप में स्वीकार किया है। वे आधुनिक युगबोध की भाषा बांग्ला और अंग्रेज़ी की जगह ब्रज, खड़ी बोली, संस्कृत और उर्दू की ओर झुकते हैं। उन्होंने वैदिक वाङ्मय का गहन अनुशीलन किया था। प्रो. मिश्र ने प्रसाद के नाम निराला के पत्र का रोचक प्रसंग भी सुनाया। अन्त में उन्होंने प्रसाद के साहित्य में धर्म की उपस्थिति और लक्षणों पर बात की। धर्म से व्यक्ति को आश्रय मिलता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी ने इन्द्र को विशेष महत्व दिया। पुनः वे शैव दर्शन से प्रभाव ग्रहण करते हैं। प्रो. मिश्र जी ने कहा कि शिव तत्त्व जाग्रत तत्त्व है जो सबमें व्याप्त है। उन्होंने कहा कि प्रसाद क्रांतद्रष्टा कवि हैं। उन्होंने समता नहीं समरसता को महत्त्व दिया। समरसता बड़ा जीवन मूल्य है। जीवन, जगत और आत्मा से ही समरसता आएगी। प्रसाद आत्मवाद में विश्वास करते हैं, देहवाद में नहीं। अन्त में उन्होंने कहा कि प्रसाद जी की दृष्टि मंगलवादी थी, उपयोगितावादी नहीं थी। प्रेम की चरितार्थता में पूर्ण समर्पण होना चाहिए। प्रसाद श्रद्धासमन्वित बुद्धि को महत्त्व देते हैं। 

प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह (हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि इतिहास और दर्शन प्रसाद जी के साहित्य का शिलापट्ट है। प्रसाद जी के व्यक्तित्व में शिवत्व और बोधिसत्व साथ-साथ झलकता है। प्रसाद जी एकाकीपन में विश्वास करते थे। उनके मुखमंडल पर सामुद्रिक गांभीर्य दिखाई देता है। प्रसाद जी की कहानी ‘मदन मृणालिनी’ के माध्यम से उन्होंने चिंता तत्त्व पर बात रखी। वे निखिल विश्व में शिव को मानते हैं। उनके साहित्यिक विकास पर शैव दर्शन का प्रमुख प्रभाव भी था। प्रो. योगेन्द्र जी ने नासदीय सूक्त, पृथिवी सूक्त आदि के माध्यम से प्रसाद के साहित्य में सनातन सूत्रों को लक्षित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि प्रसाद जी का दर्शन लोकोन्मुखी है। 

इस सत्र का संचालन प्रो. अलका पांडेय तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. हेमांशु सेन ने किया। 

समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि श्री सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ की महनीय उपस्थिति रही। स्वागत वक्तव्य प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह तथा उपस्थित सभी विद्वानों एवं शिक्षार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने किया। 

सत्र की विशेष प्रस्तुति में प्रसाद जी की दो कहानियों का वाचन किया गया। ‘चूड़ी वाली’ कहानी का वाचन डॉ. नूतन वशिष्ठ, सोम गांगुली और पुनीता अवस्थी ने किया। दूसरी कहानी ‘छोटा जादूगर’ का वाचन हेमंत शुक्ला, अनवारुल हसन और पुनीता अवस्थी ने किया। 

सत्र का संचालन प्रो. श्रुति ने किया। जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी श्री अवधेश कुमार गुप्त और डॉ. कविता प्रसाद ने भी आयोजन को लेकर अपनी बात रखी और आयोजन में सहयोगी संस्थाओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। 

इस चतुर्दिवसीय भव्य महोत्सव का आयोजन महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश सरकार, राज्य ललित कला अकादमी, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग तथा ललित कला संकाय, लखनऊ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया। कला प्रदर्शनी में प्रसाद जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित चित्रों के लिए उदीयमान चित्रकारों का अभिनंदन किया गया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में शोध पत्रों का वाचन भी किया गया। इस आयोजन में लखनऊ विश्वविद्यालय सहित शहर के अन्यान्य संस्थाओं के आचार्यगण तथा छात्र-छात्राओं की उत्साहपूर्ण सहभागिता हुई।

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