विलुप्त होती लोककला की पहचान और मानवीय गरिमा की सशक्त अभिव्यक्ति ’लौंडा नाच’

विलुप्त होती लोककला की पहचान और मानवीय गरिमा की सशक्त अभिव्यक्ति ’लौंडा नाच’
जौनपुर। ‘लौंडा नाच’ एक संवेदनशील और यथार्थपरक फ़िल्म है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की पारंपरिक लोककला लौंडा नाच के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्ष को गहराई से प्रस्तुत करती है। यह फ़िल्म उन कलाकारों की कहानी कहती है, जिन्हें कभी उत्सवों का केंद्र माना जाता था, लेकिन समय के साथ सामाजिक उपेक्षा, तिरस्कार और पहचान के संकट का सामना करना पड़ा।
फ़िल्म का निर्देशन आशुतोष उपाध्याय ने किया है, जो पिछले 12–15 वर्षों से भारतीय सिनेमा की अग्रणी प्रोडक्शन कंपनियों जैसे धर्मा प्रोडक्शंस, ज़ी स्टूडियोज़ और पेन इंडिया के साथ कार्य कर चुके हैं। उनका सिनेमा सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाओं को संयमित और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है।
छायांकन की ज़िम्मेदारी विजय मिश्रा ने संभाली है, जिनका कार्य रक्तांचल, इंदौरी इश्क़ और धारावी बैंक जैसे प्रशंसित प्रोजेक्ट्स में देखा जा चुका है। फ़िल्म की दृश्य भाषा कहानी की पीड़ा, संघर्ष और सौंदर्य को सहजता से उभारती है। फ़िल्म में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं युवराज पराशर, जिन्होंने फैशन, डननो वाय और द पास्ट जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्मों में अपने अभिनय से अलग पहचान बनाई है।
उनके साथ इंदिरा तिवारी, जो गंगूबाई काठियावाड़ी में संजय लीला भंसाली के निर्देशन में अपने सशक्त अभिनय के लिए सराही गईं और कई फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं, इस फ़िल्म में एक प्रभावशाली किरदार में नज़र आती हैं।
वरिष्ठ अभिनेता मनोज टाइगर, जिन्हें दर्शक बताशा चाचा के नाम से जानते हैं, पिछले दो दशकों से भारतीय सिनेमा में सक्रिय हैं और फ़िल्म को अनुभव की गहराई प्रदान करते हैं।
युवा कलाकारों में गणेश चव्हाण (क्राइम आज कल), विभा बाजपेयी सहित कई प्रतिभाशाली कलाकार फ़िल्म का हिस्सा हैं। फ़िल्म के कार्यकारी निर्माता आलोक तिवारी हैं,सहायक निर्देशन की ज़िम्मेदारी श्रवण मकवाना और विभा बाजपेयी ने संभाली है,।
‘लौंडा नाच’ का निर्माण मूवी मस्ती मैजिक स्टूडियोज़, लाइटबॉय फ़िल्म्स और विष धुन के बैनर तले किया गया है।
यह फ़िल्म केवल एक कला-प्रथा की कहानी नहीं है, बल्कि पहचान, सम्मान, जेंडर परसेप्शन और समाज की सामूहिक स्मृति पर एक गहरी टिप्पणी है। ‘लौंडा नाच’ समकालीन भारतीय आर्ट सिनेमा में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत होती है और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों के लिए एक सशक्त दावेदार है।

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