*सत्य से दूर......!*बचपन से ही....!दिल और दिमाग दोनों को,कायदे से समझाया गया....

*सत्य से दूर......!*
बचपन से ही....!
दिल और दिमाग दोनों को,
कायदे से समझाया गया....
सत्य की सत्ता और सत्य की महत्ता
जिसे दिल...हरदम मानता भी रहा..
पर दिमाग....खेल करता रहा...
तर्क भी करता रहा....क्योंकि...!
दुनियावी भीड़ में...बड़ी जल्दी ही..
इसने पढ़ लिया कि....
सत्य की सत्ता बदलती रहती है....!
देशकाल और वातावरण के अनुसार
देख लिया इसने....समाज में...
कितनी रखी जा रही है...?
मर्यादा सत्य की...
कितना किया जा रहा है....?
अनुकरण सत्य का....
यह भी देख लिया कि....!
कितनी गहरी जड़े हैं सत्य की.....
यह भी जान लिया कि....!
न्याय अंधा होता है...और...
गुनाह परदे के पीछे होता है....
वहीं दिल तो.....बेचारा ठहरा....
मोहब्बत की तलाश में....!
बस हर किसी के पास तक,
आने की आस में....  
धड़कता रहा दिन-रात सारा...
लेकर बोझ सारा का सारा....!
खुद चोट पर चोट खाता रहा....पर...
नसीहत की ज़मी पर...
पगले दिमाग को...
वजूद सत्य का..!
हर पल करीने से बताता रहा....
मित्रों.....सच पूछो तो....!
इस प्रकार दोनों ही में....हरपल...
अच्छा-खासा द्वंद जारी रहा ....
इस द्वंद में....दिल पर दिमाग...!
हमेशा ही भारी रहा...और...
हरदम दिमाग की सुनना...
नाजुक दिल की लाचारी रहा
बस इसीलिए प्यारे....!
सदा सत्य बोलने के लिए
मनुष्य कसम पर कसम खाता रहा
और सफर उसका ...सत्य से दूर....
बहुत ही दूर जाता रहा....!!
बहुत ही दूर जाता रहा....!!

रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ

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