"सब होता रहे मनभावन" (कविता)
"सब होता रहे मनभावन" (कविता)
अब रंग-रूप भी"अपना"...
है जैसे ईंटो का "झावन"...
पर आने वाला "सावन" तो....
अब उम्र गिनेगा पूरे "बावन"....
बस आस यही है तुमसे "भोले"...
कि दर्शन मिलता रहे तेरा "पावन"...
आशीष मिले इतना मुझको....
निकल ही जाए बाहर पूरा.....
इस बार...मन का मेरे "रावन"...
संग इसी के प्रभु विनती है यह भी
कृपा बने कुछ ऐसी कि....!
सब होता रहे मनभावन....
सब होता रहे मनभावन....
रचनाकार - कवि जितेन्द्र कुमार दुबे
संप्रति - अपर पुलिस उपायुक्त मध्य कमिश्नरेट, लखनऊ
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