*न खुद जाने न खुदा.....!*

*न खुद जाने न खुदा.....!*
बालों  में कड़वा तेल डालें....!
कंधे पर लाल गमछा लिये,
घुटने तक मटमैली धोती के साथ..
फटा हुआ कुर्ता पहने....!
पकी रुआबदार मूंछों वाला हरिया
 समाज मे घोषित मजदूर है....
आलीशान महल,हवेली,बार और
होटल रिसार्ट से नजदीकी रिश्ता..
होने के बावजूद भी....
बस सुरती-बीड़ी-तंबाकू तक का
या फिर...कुछ ज्यादा होने पर..
माटी की चिलम में...सूत के ऊपर
पाँच रुपये के गाँजे पर,
मुफ्त की आग का नशा....
कभी-कभार किसी महफिल में..!
कच्ची दारू का नशा....
मजदूरी का दो हिस्सा खाने में,
एक हिस्सा कर्ज़ चुकाने में....
श्रम-कमाई और खर्च का बस....!
इतना सा हिसाब-किताब.....
रोज की हाड़ तोड़ मेहनत पर.....!
सुबह में बासी रोटी पर,
घलुए में रखा हुआ अचार.....
दुपहरी मालिक की मर्जी पर...
कभी-कभार गला तर करने भर
पानी भी नसीब में नहीं....
शाम में बीबी की तकरार के बीच
थोड़ी चटक मसालेदार थाली...
फिर वही चलताऊ मनोरंजन...
यह "हरिया" आज भी मजदूर है...
कंधे पर लैपटॉप लटकाकर,
कानों में मोबाइल की लीड डालें...
साइकिल की जगह बाइक.....!
मेट्रो या अन्य साधन से....
जा रहा है मजदूरी को....
एल्युमिनियम फाइल से,
लिपटी हुई रोटी टिफिन में लिए...
थोड़ी सी भुजिया के संग....
अक्सर नूडल्स या फास्ट फूड...
संग इसके गुड़ की जगह मिठाई...
इतना ही नहीं फर्क और भी है...!
हरिया अब "मिस्टर हरिया" है...
गमछे की जगह....!
नैपकिन यूज़ करता है.... 
मूंछों की स्मार्टनेस....
बनाए रखने का....
हर जतन करता है.....
कमाई का दो हिस्सा अब कर्ज पर
और....एक हिस्सा भोजन पर....
खर्च करता है...और...
ज़्यादा क्या कुछ कहूँ.....
मित्रों...स्थितियाँ सचमुच बदली है
मजदूर....हरिया की.....
जो पहले के दिनों में
शाम को दिया जलने से पहले
घर वापस आता था....
बिना टारगेट की.....!
मजदूरी करता था
 वही हरिया अब.....
टारगेट बेस्ड मजदूरी करता है....
और.....घर वापस आने का...
समय  उसका....!
न खुद जाने न खुदा.....!

रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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