"नाव का सबक"
"नाव का सबक"
सूरज डूबा पहाड़ के पार,
झील में उसके रूप हज़ार।
ताम्र-पत्र सा लाल किनारा,
पानी दर्पण सा मौन सहारा।
नाव बँधी है तट के साथ,
कैदी सी थामे सूनी रात।
पतवार पड़ी है आस लगाए,
सोए स्वप्न सी साँस छुपाए।
बादल राख से बिखरे काले,
चीड़ खड़े प्रहरी से मतवाले।
पत्थर पूछें लहरों से बात,
कब तक यूं ही कटेगी रात?
गहरा भाव बस इतना यार,
मन भी नाव सा मझधार।
डर के किनारे से जो बँधा,
वो कब तक बहा? कब उभरा?
डूबना भी ज़रूरी है इक बार,
तभी उगेगा नया उजियार।
पकड़ के रखना केवल पतवार,
बह जा यही है जीवन सार।
पेंटिंग साभार:श्री हेमंत कोठारी जी ।
आनंद पाण्डेय "केवल"
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