लहरों सा हौसला तूफानों सी उड़ान थी, अजीत दादा की ऐसी पहचान थी।
लहरों सा हौसला तूफानों सी उड़ान थी, अजीत दादा की ऐसी पहचान थी।
पिछले छह मास से मैं अजीत दादा को मैं बहुत मीस कर रहा हूँ।उनके साथ के कई संस्मरण मुझे याद है।
दादा आप आज आपके जन्म दिन पर आपकी वह बात याद आ रही है, जब आपने आज से दो दशक पहले मुझे कहा था कि पवार साहेब (शरद पवार) के जन्म दिन पर बहुत अच्छा आर्टिकल लिखा था। मेरे जन्म दिन पर क्यों न लिखा? पवार साहेब का जन्म दिन 12 दिसंबर को होता है।दादा का जन्म दिन 22 जुलाई है। उस समय मैं बड़ा ही आश्चर्यचकित होकर दादा की ओर देखने लगा।मुझे लगा दादा का जन्म दिन बीते पांच माह हो गये हैं, फिर भी दादा को याद है। तब दादा मुस्कुराकर आगे चल दिए। कभी यह सोचा नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं दादा के बारे में यह लिखूँगा।आज दादा की कमी मुझे जिस तरह से महसूस हो रही है, वैसी ही उनकी कमी महाराष्ट्र की राजनीति ही नहीं हर कोने -कोने
को महसूस हो रही है। दादा के विषय में उनकी स्पष्टवादिता से हम सभी परिचित हैं,लेकिन उनका हृदय बड़ा ही संवेदनशील था। उनकी मुस्कराहट तो जादू भरी थी।शायद यही वजह थी कि उनके पास आम लोगों की भीड़ लग रहती थी।वास्तव में वे लोगों की समस्याओं को बड़े ध्यान से सुनकर उसका निराकरण करते थे।शायद यही कारण है कि आज भी लोग सह कहते है, काश!आज दादा होते,तो यह काम हो जाता।उसका मूल कारण उनका राजनीतिक, सामाजिक,आर्थिक, औद्योगिक और सहकार क्षेत्र में उनकी सर्वश्रेष्ठ भूमिका है।उन्हें यह श्रेष्ठता ऐसे ही नहीं मिली थी,उन्हें लोगों की अपेक्षाओं, दैनिक की समस्याओं और प्रशासन की गहरी समझ थी।दादा ने अपनी प्रशासनिक क्षमता, संगठन कौशल और जनता से सीधे जुड़ाव के बल पर ऐसी पहचान बनाई,जिसके शिल्पकार वे स्वयं थे।शायद यही वजह थी कि दो दशक तक महाराष्ट्र की राजनीति दादा के साथ ही चलती रही।वे सभी के आकर्षण के केंद्र रहे।दादा एक ऐसे नेता रहे जिन्होंने कभी से जाति,धर्म और निवास स्थान नहीं पूछा।वह किसी को अपना पैर नहीं छूने देते थे।असंभव से असंभव लोगों का काम जब हो जाता था,तब लोग उनके पास कृतज्ञता व्यक्त करने आते थे तो, वो कहते थे कि," आप काम लेकर आइये,कृतज्ञता व्यक्त करने क्यों आते हैं?" दादा किसी भी समस्या का तत्काल हल निकालते थे, वे तुरंत संबंधित अधिकारी से फोन पर बात करते थे।देश के सबसे बड़ी पंचायत के 1991 में बारामती से सदस्य चुने जाने वाले जय और पार्थ जैसे होनहार सुपुत्रों के पिता और शालीनता की देवी सुनेत्रा पवार के जीवन साथी महाराष्ट्र राज्य के छह बार के उपमुख्यमंत्री रहे दादा दिल के बहुत बड़े थे।
वे अपने विरोधी दल के नेताओं के अच्छे कामों पर मुक्त कंठ से प्रशंसा करते थे। दादा की किसी से दुश्मनी नहीं थी। वे दिल से दोस्ती निभाते थे। संपूर्ण महाराष्ट्र ने कभी सोचा नहीं था कि दादा इतनी जल्दी उन्हें छोड़कर जा सकते हैं।मंत्रालय की हर सीढ़ी दादा की मुस्कराहट के इंतजार में है। महाराष्ट्र की राजनीति में दादा की कमी हम सभी को खलती रहेगी।
शायद यही वजह है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उनके निधन के पश्चात कहा कि महाराष्ट्र नेवर हैड बेस्ट सीएम।
चंद्रवीर बंशीधर यादव (लेखक महाराष्ट्र के सामाजिक चिंतक एवं शिक्षाविद्)
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