164 सृजन संवाद में कथाकार-संपादक शंकर के रचनाकर्म पर गंभीर विमर्श
164 सृजन संवाद में कथाकार-संपादक शंकर के रचनाकर्म पर गंभीर विमर्श
जमशेदपुर, झारखण्ड। साहित्य, सिनेमा और कला को समर्पित संस्था ‘सृजन संवाद’ के 164वें ऑनलाइन आयोजन में वरिष्ठ कथाकार-संपादक शंकर के रचनाकर्म पर विस्तृत एवं गंभीर चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण स्ट्रीमयार्ड एवं फेसबुक लाइव के माध्यम से सायं 7:00 बजे से किया गया। स्ट्रीम यार्ड का संचालन अनुराग रंजन ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत वक्तव्य से हुआ, डॉ. विजय शर्मा ने उपस्थित साहित्यप्रेमियों, वक्ताओं एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए शंकर के साहित्यिक योगदान को भारतीय कथा-साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। साथ ही उनसे अपने जुड़ाव के किस्से को भी साझा किया। उन्होंने संवादियों को शुभकामनाएं दीं।
इसके बाद अर्चना अनुपम ने कथाकार शंकर का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने शंकर के जीवन, साहित्यिक यात्रा, प्रमुख कृतियों तथा हिंदी कथा-साहित्य में उनके विशिष्ट स्थान पर प्रकाश डालते हुए बताया, शंकर ने अपने लेखन में समाज, मनुष्य और बदलते समय की जटिलताओं को अत्यंत संवेदनशीलता एवं यथार्थपरक दृष्टि से अभिव्यक्त किया है।
मुख्य संवाद सत्र में महेश दर्पण एवं प्रो. अरुण होता ने शंकर के रचनाकर्म का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। लेखक एवं संपादक महेश दर्पण ने संपादक के रूप में शंकर के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया, कैसे शंकर ने नई पीढ़ी के लेखकों की एक पूरी फौज तैयार की है। वो सिर्फ नए रचनाकारों को स्थान नहीं देते हैं, बल्कि उनकी रचनाओं को स्थापित करने में भी सहयोग करते हैं। उनकी रचनाओं पर लगातार संवाद को प्रोत्साहित करते हैं। महेश दर्पण के अनुसार परिकथा पत्रिका एवं नए लेखकों को स्थापित करने में शंकर जी ने अपने लेखन कर्म को कम समय दिया।
दूसरे संवादी वरिष्ठ आलोचक, पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ अरुण होता ने कथाकार एवं उन्यासकार के रूप में शंकर की रचनाओं का बारीकी से विश्लेषण किया। शंकर की कहानियाँ केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि वे मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विसंगतियों, मध्यवर्गीय जीवन के संघर्षों तथा बदलते सामाजिक मूल्यों को गहराई से सामने लाती हैं। उनकी भाषा सहज, प्रभावशाली और पाठकों से सीधा संवाद स्थापित करने वाली है।
कार्यक्रम के अंत में वीणा कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
डॉ. विजय शर्मा ने कार्यक्रम का समापन साहित्य और समाज के बीच सार्थक संवाद को निरंतर बनाए रखने के संकल्प के साथ किया। अगले माह की गोष्टी सिनेमा पर होगी। पटना से कथाकार कमलेश, दिल्ली से कहानीकार-उपन्यासकार प्रज्ञा रोहिणी, लेखक राजेश राव, गोमिया से सिनेमा लेखक प्रमोद कुमार बर्णवाल, मुज्जफ़रपुर से कथाकार पूनम सिंह, अमेरिका से कहानीकार-उपन्यासकार उर्मिला शिरीष, पुणे से सिने-इतिहासकार-विशेषज्ञ मनमोहन चड्ढ़ा, राँची से यायावरी वाया भोजपुरी फ़ेम वैभव मणि त्रिपाठी, जमशेदपुर से साहित्य-कला फ़ाउंडेशन की मुख्य ट्रस्टी डॉ. क्षमा त्रिपाठी, अर्चना अनुपम कर्ण, बंग्लोर से पत्रकार अनघा मारीषा, कवि परमानंद रमण, शैलेंद्र शांत आदि देश-विदेश से जुड़े साहित्यप्रेमियों ने ऑनलाइन सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया।
Comments
Post a Comment