गुरु शिष्य का औपचारिक मुलाकात

गुरु शिष्य का औपचारिक मुलाकात 
स्नातक संस्कृत द्वितीय वर्ष में वेद पढ़ाने वाले गुरुदेव प्रोफेसर शिवशंकर अवस्थी के पास हम तीन विद्यार्थी परीक्षा हेतु इंपार्टेंट पूछने पहुंचे। गुरुदेव का पादोपसंग्रहण कर हम लोग खड़े हो गए।एक या दो मिनट के उन्होंने पूछा कि कैसे आये हो।हम लोगों ने अपना मंतव्य बतलाया गुरुदेव एक मिनट बाद बोले कठोपनिषद की तृतीय वल्ली का यह मंत्र कंठस्थ कर लेना जिसमें आचार्य यम जिज्ञासु विद्यार्थी नचिकेता से कहते हैं कि उठो,जागो और श्रेष्ठ जनों से ज्ञान प्राप्त करो।हम लोगों ने पुनः गुरुदेव का पादोपसंग्रहण किया और चल पड़े।हम सब में आह्लाद का अतिरेक था कि गुरुदेव ने एक ही इंपार्टेंट बताया है तो यह जरूर परीक्षा में आयेगा परंतु यह अंश परीक्षा में पूछा ही नहीं गया।हम लोग परीक्षा समाप्त होने पर गुरुदेव के निवास पर पहुंचे।सब पादोपसंग्रहण कर खड़े हो गए।एक दो मिनट के बाद पूछा कि कैसे आना हुआ हम लोगों ने कहा कि गुरुदेव आपने एक ही इंपार्टेंट बताया था वह भी  परीक्षा मे आया ही नहीं। गुरुदेव ने कहा कि मैंने इंपार्टेंट तीन घंटे के लिए नहीं पूरे जीवन काल के लिए बताया।अब जाइए और जीवन भर इस कथन को स्मरण रक्खें और तदनुसार आचरण करें।हम लोगों ने गुरुदेव का पादोपसंग्रहण किया और चल पड़े।प्रो शिवशंकर अवस्थी की पुस्तक मन्त्र और मातृकाएं का रहस्य विलक्षण ग्रंथ है। मुझे वेदविद्या विशारद गुरुदेव प्रो विश्वंभर नाथ त्रिपाठी के श्रीमुख से ऐतरेय ब्राह्मण   के तृतीय अध्याय के तृतीय खणड के उन पांच मंत्रों को सुनने को मिला जिसमें इन्द्र रोहित से  कहते हैं कि चरैवेति चरैवेति चलते रहो चलने से ही सफलता मिलती है। धर्मशास्त्र के महापंडित प्रो उमेशचन्द्र पाण्डेय ने अभिज्ञानशाकुंतलम् पढ़ाते समय प्रथम अंक के दूसरे श्लोक में सूत्रधार के इस कथन पर विशेष बल दिया था जिसमें वह कहता है कि मैं तब तक प्रयोग विज्ञान,लेखन आदि,को सफल नहीं मानता जब तक उसे विद्वान सही नहीं मानते क्यों कि बड़े बड़े विद्वान् भी अपने प्रयोग,लेखन आदि में अपनी सफलता के विषय में संशयग्रस्त रहते हैं। हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान प्रो रामचन्द्र तिवारी ने त्रिवेणी पढ़ाते समय जब तुलसीदास पर बोलना शुरू किया तब कहा कि गोस्वामी तुलसीदास का यह कथन गांठ बांध लीजिए।जौं प्रबंध बुध नहिं आधारहीं,सो श्रम बादि बाल कवि करहीं। विद्वानों से सीखना चाहिए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रत्यक्ष अन्तेवासी शिष्य प्रो भगवती प्रसाद सिंह  मानस की इस पंक्ति को हम लोगों से व्यवहार में उतारने को कहते थे।सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ।।अरण्य काण्ड में यह कथन श्रीराम का है। साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गुरुदेव प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कामायनी के इस वाक्य को याद रखने को कहते थे ,पाने की इच्छा हो तो योग्य बनो। अंग्रेजी के गुरुदेव प्रो यदुवंश राम त्रिपाठी पालग्रेव की गोल्डन ट्रेजरी पढ़ाते हुए कहते थे इसकी कविताएं तुम लोगों के लिए जीवन भर गोल्डन ट्रेजरी बनी रहेंगी।वे कालांतर में साकेत पी जी कालेज अयोध्या के प्राचार्य हुए मैं संत तुलसीदास पी जी कालेज कादीपुर सुल्तानपुर में संस्कृत विषय में शिक्षक।एक कार्यक्रम में सुल्तानपुर में मेरी भेंट गुरुदेव प्रो त्रिपाठी जी से हो गयी। मैंने उनका पादोपसंग्रहण किया और कहा कि आपने मुझे 1968/1969 में गोरखपुर विश्वविद्यालय में गोल्डन ट्रेजरी पढ़ायी थी, उन्होंने तपाक से पूछा कि स्टिल यूं हैव गोल्डन ट्रेज़री। मैं अवाक रह गया। कुछ उत्तर देते नहीं सूझा। फिर उन्होंने कहा कि पढ़ते रहो लिखते रहो, विद्वानों की संगति करते रहो।यह मेरा सौभाग्य है कि देश के सुप्रतिष्ठ हिन्दी संस्कृत तथा प्राचीन इतिहास के सुविज्ञों का मैं सारस्वत स्नेह पात्र था और आज भी हूं। ऐसे विद्वानों की संख्या लगभग सत्तर है।कुछ नाम गिना रहा हूं । पंडित मुकुट धरो पाण्डेय,प्रो सत्यव्रत शास्त्री ,वियोगी हरि,प्रो भगीरथ मिश्र, प्रो सत्यकेतु विद्यालंकार, कुबेरनाथ राय प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित प्रो हरिशंकर मिश्र तथा डा श्रीपाल सिंह क्षेम आदि। कालांतर में  एकहत्तर प्रकाशित कृतियों के प्रणेता साहित्य भूषण साहित्य महोपाध्याय पं विजयशंकर मिश्र भास्कर से मेरा परिचय हुआ। यद्यपि आप विज्ञान और गणित के विद्यार्थी रहे पर आपका हिन्दी और संस्कृत साहित्य में पांडित्यपूर्ण अधिकार है।आपने कालिदास रचित रघुवंशम् के चार पांच श्लोकों का हिन्दी में भावानुवाद किया और मुझे दिखाया।इसे मैंने मनोयोग पूर्वक ‌पढा। मुझे प्रतीत हुआ कि भास्कर जी की लेखनी को कालिदास ,सरस्वती जी, चतुर्मुखी ब्रह्मा जी और महाकोलाचल मल्लिनाथ का सारस्वत आशीर्वाद प्राप्त है। मैंने भास्कर जी से इतना ही कहा कि आप पूरे रघुवंश का काव्य में भावानुवाद कर डालिए जो लोग हिन्दी भाषा के माध्यम से रघुवंश पढ़ना चाहते हैं उन पर आपका कालजयी उपकार होगा।  भास्कर जी को सारस्वत प्रलोभन देते हुए कहा कि राग रसोई पागडी कबहुं कबहुं बनि जाय।इस महत्कार्य के संपादनार्थ आपको इस समय दैवी शक्ति सहायता करेगी। भास्कर जी की लेखनी चल पड़ी।एक दिन भास्कर जी ने कहा कि रघवंश के अश्लील शृंगारिक प्रसंग मुझमें असमंजस पैदा कर रहे हैं, मैं क्या करूं। मैंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास का स्मरण कीजिए जिन्होंने मानस में लिखा है कि ,जे गावहिं यह चरित संभारे,थे एहि ताल चतुर रखवारे।आप रसराज शृंगार का श्लील निरूपण कीजिए,कामायनी के काम की तरह । भास्कर जी की यह कालजयी कृति पूर्ण हुई जिसमें साहित्यभूषण डा उमाशंकर शुक्ल शितिकंठ ,डा चन्द्रशेखर तिवारी,कविकुलकलाधर आदरणीय मथुरा प्रसाद सिंह जटायु के साथ मेरी भी सम्मति प्रकाशित है। भास्कर जी ने इस कृति को श्री गांधी स्मारक महाविद्यालय समोधपुर जौनपुर के बान्नबे वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक डा  मुनीन्द्र सिंह को समर्पित किया है जिनसे भास्कर जी ने इंटरमीडिएट की कक्षा में दिलीपस्य गोसेवा पढ़ी थी। भास्कर जी ने कहा कि आपकी प्रबल प्रेरणा से यह कृति पूरी हो गयी।आप मेरे साथ जौनपुर चलिए वहीं मैं गुरुदेव डा मुनीन्द्र सिंह को यह कृति समर्पित करुंगा। गुरुदेव डा मुनीन्द्र सिंह संस्कृत के अधिकारी पंडित हैं और यथा नामे तथा गुणें हैं। विद्वानों का सम्मान विद्वन्मंडली करे तो सोने में सुगंध पैदा हो जाय।मैंने इस सारस्वत यात्रा में सहयात्री बनने के लिए महाकवि मथुरा प्रसाद सिंह जटायु से आग्रह किया,अनेक कार्यक्रमों को तिलांजलि देकर मेरे साथ चलना स्वीकार किया। जटायु जी मुझसे डेढ़ महीने बड़े हैं और भास्कर जी करीब साढ़े तीन साल छोटे।चूंकि बान्नबे वर्षीय विद्वान के सम्मान में चलना था तो राम चरन इंटर कॉलेज रवनियां के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य अनेक शिक्षा संस्थाओं के प्राणवायु, श्रीराम कथा के विस्तारक,डा मुनीन्द्र सिंह के पुरा परिचित  चौरासी वर्षीय राजर्षि उदयभान सिंह को साथ चलने का आग्रह किया जाय। भास्कर जी की बात सुनकर जटायु जी और आदरणीय सिंह साहब बिना ननु नच किए तैयार हो गये। मैं 06/03/2026 को आदरणीय जटायु जी के साथ भास्कर भवन समुदा लगभग ग्यारह बजे पहुंचा। भास्कर जी का भव्य भवन और पुस्तकालय देखकर आदरणीय जटायु जी ने कहा कि भास्कर जी पर सरस्वती और लक्ष्मी जी की समान कृपा है। भास्कर जी जटायु जी और मैं आदरणीय उदयभान सिंह के भव्य भवन के द्वार पर उपस्थित हुए।हम लोगों की आवाज सुनकर गुरुदेव कुर्ता ठीक करते हुए बाहर निकल ही रहे थे कि अंदर से आवाज जैकेट भी पहन लीजिए।और इन सबको जलपान कराने के बाद ही जाइए।यह आवाज श्री उदयभान सिंह की अर्धांगिनी श्रीमती प्रेमलता सिंह की थी। आदरणीया श्रीमती प्रेमलता सिंह उपप्रमुख ब्लाक खुटहन जौनपुर रह चुकी हैं और समर्पित समाजसेविका और प्रबुद्ध पाठिका हैं।आपके तीनों सुपुत्र गरिमामय पद पर आसीन हैं और सपरिवार संबंधित स्थान पर रहते हैं। गुरुदेव और उनकी पत्नी भव्य में रहते हैं और सहयोग के लिए कोई न कोई विद्यार्थी रहता है जिसे अध्ययन की व्यवस्था आप करते हैं और पूरा खर्च उठाते हैं। आपके यहां रहते हुए छत्तीसगढ़ के दो आदिवासी छात्रों ने पूरी शिक्षा प्राप्त की और कालांतर में उनकी इच्छा होने पर उन्हें ससम्मान विदा किया। संप्रति कुछ प्रज्ञा सिंह आपके घर रहकर शिक्षा प्राप्त कर रही है।उसकी आकृति प्रकृति और संस्कृति से सब उसे गुरुदेव की पौत्री समझते हैं।उसने जलपान की व्यवस्था की।मेरी इच्छा थी कि मैं राष्ट्रीय रामायण मेला चित्रकूट तथा श्री सत्यदेव तिवारी द्वारा संपादित पत्रिका कुशभवनपुर संदेश गुरुदेव को समर्पित करूं। मैंने भास्कर जी से आग्रह किया कि आप रघुवंश गौरव भी गुरुदेव को अर्पित करें। भास्कर जी इसकी योजना पहले ही बना चुके के थे। मैंने गुरुदेव से आग्रह किया कि आप अपनी अर्धांगिनी को बुला लीजिए।वे भी पुस्तक ग्रहण करें। गुरुदेव ने समीप में खड़ी पत्नी श्रीमती प्रेमलता सिंह को पुकारा और पुस्तक ग्रहण करने को कहा। मैंने जटायु जी और भास्कर जी पत्रिका तथा पुस्तकें विद्वान् दम्पति को समर्पित की,जिसे आप दोनों ने सादर स्वीकार किया। मैंने जटायु जी और भास्कर जी से कहा कि कि रघुवंश के महाराज दिलीप और महारानी सुदक्षिणा ऐसे ही रही होंगी। गुरुदेव श्री सिंह साहेब ने कहा कि बदलापुर के पास सरोखनपुर में समाजसेवी सुभाष सिंह नेता रहते हैं उनसे मिलते चलिए।हम लोग श्री सुभाष सिंह नेता के प्रासादवत भव्य भवन के समक्ष खड़े हुए। भास्कर जी प्रासादवत भव्य भवन की प्राभा निरख ही रहे थे कि परिसर में पल्लवित पुष्पित लता वृक्षों की विविधता देखकर जटायु जी बोल पड़े कि यह तो दिव्य आश्रम है।हम लोगों के आगमन की सूचना उनके शृंखलाबद्ध विशिष्ट कोटि के श्वान ने दे दी। आदरणीय नेता जी तत्काल आए और गुरुदेव उदयभान सिंह को साथ में देखकर समझ गये कि ये लोग भी भले आदमी होंगे ही ,आपने सबका यथोचित सम्मान किया। स्वागत में मिठाईयों के पात्र आ गये।इसी बीच नेता जी के अनुज और सल्तनत बहादुर पी जी कालेज बदलापुर के प्रबंधक श्री श्याम सिंह आ गये। उन्होंने कहा कि आगे भी देख लीजिए।उनके परिसर की विस्तृति और दीप्ति विलक्षण है। थोड़ी दूर पर विशिष्ट कोटि के दो श्वान बंधे थे एक बड़ा और एक छोटा। थोड़ी दूर दो तीन गौएं भी थीं। आपने बताया कि छोटे कुत्ते की पूंछ और कान को लेजर विधि से काटा जायेगा ताकि इसे दर्द न हो और इसके लिए इसे मेरठ ले जाउंगा।यह बड़ा होकर भयंकर होगा। बड़ा कुत्ता भूंककर नौकर को बता देता है कि मेरी कार आ गयी है।यह प्रकरण 06/03/2026 का है। मैंने 09/03/2026 के समाचार पत्र में पढ़ा कि बलिया के एक उपजिलाधिकारी महोदय का पुटबिल कोटि का है। कहते हैं कि भारत में तीन साल पहले ही इस कोटि के कुत्ते पालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।जो भी हो उपजिलाधिकारी महोदय के बंगले पर उनके माता-पिता पिता आये। संभव है कि कुत्ते ने पहली बार इनको बंगले पर देखा हो। उसने स्वामिभक्ति में उन अपरिचितों को काटना चाहा। उपजिलाधिकारी महोदय अपने माता-पिता को बचाने और कुत्ते को हटाने दौड़े।कुत्ते का क्रोध और विकराल हो गया और उसने उपजिलाधिकारी महोदय के दोनों हथेलियों को ऐसा काटा कि वे दवा हेतु अवकाश के लिए हस्ताक्षर न कर सके। उन्होंने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाया। कुत्तों से सावधान रहना ही चाहिए चाहे बालक हो या वयस्क।भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुत्तों के आतंक को मिटाने को कहा है।हम लोग आत्मिक स्वागत सत्कार से तृप्त होकर गुरुदेव मुनीन्द्र सिंह के आवास पर गये जहां उनके सुपुत्र सिंह श्री प्रेमशंकर सिंह ने हम सबका हार्दिक स्वागत किया।वयोवृद्धता विषयक अनेक समस्याओं से ग्रस्त बान्नबे वर्षीय पिता डाॅ. मुनीन्द्र सिंह की अहर्निश सेवा में  रत देखकर पुत्र प्रेमप्रकाश सिंह को आधुनिक श्रवण कुमार कहना ही पड़ा।मानापुर प्रतापगढ़ के श्री अंजनीकुमार सिंह के पिता स्व अंबिका प्रसाद सिंह ने चौरान्नबे साल में महाप्रयाण किया। अंजनीकुमार सिंह ने वयोवृद्ध पिता की भरपूर सेवा की। गुरुदेव मुनीन्द्र सिंह के चरणों में बैठकर भास्कर जी ने गुरु के सारस्वत करों में रघुवंश गौरव समर्पित किया और कहा कि आज भी मेरे कानों में गुरुदेव द्वारा पढायी जा रही दिलीपस्य गोस़ेवा की पंक्तियां गूंज रही हैं। मैंने अपनी पुस्तक योगतत्त्व चिंतन गुरुदेव को समर्पित की और श्री उदयभान सिंह ने पुरानी स्मृतियों को ताजा किया , दोनों गुरुदेव कभी एक ही संस्था में शिक्षक थे।श्री प्रेमशंकर सिंह के आतिथ्य से तृप्त हो कर हम लोग चल पड़े।मेरी आदत है कि मैं जहां जाता हूं वहां के वर्तमान और दिवंगत साहित्यकारों की सारस्वत भूमि को प्रणाम करने जाता हूं।इस क्रम में हमलोग छायावादोत्तर कवियों में प्रमुख स्व. डाॅ. श्रीपाल सिंह क्षेम की सारस्वत तपोभूमि क्षेमसदन पहुंचे जहां साहित्य वाचस्पति डाॅ.क्षेम जी के सुयोग्य ज्येष्ठ सुपुत्र, जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष तथा दैनिक भास्कर समाचार पत्र के चीफ ब्यूरो श्री शशि मोहन सिंह'क्षेम' से भेंट हुई। पिता क्षेम की आकृति,प्रकृति और संस्कृति पुत्र क्षेम में प्रतिबिंबित है। आपने लगभग दो घंटे तक पिता की सारस्वत साधना का वर्णन करते रहे।स्व क्षेम जी सुकवि होने के साथ ही कुशल समीक्षक भी थे। उन्होंने मेरी तीन पुस्तकों प्रतीक्षा,कौण्डिन्य और अगस्त्य की विस्तृत समीक्षाएं लिखी थीं। मुझे तथा जटायु जी को क्षेम जी के साथ काव्यपाठ का सौभाग्य मिल चुका है। मैंने श्री शशिमोहन सिंह क्षेम से उनके पिता द्वारा रचित कृष्ण द्वैपायन महाकाव्य समूल्य चाहा तो कहा कि मैं इसे निशुल्क दूंगा और उन्होंने मुझे इस पुस्तक के साथ क्षेम रचनावली भाग छः भी दिया और कहा कि पिता जी की अन्य पुस्तकों के लिए श्री अरविन्द कुमार सिंह 'बेहोश जौनपुरी' से संपर्क कीजिए। आपने आदरणीय बेहोश जी का मो नं दिया। मैंने कहा कि मुझसे लखनऊ विश्वविद्यालय में श्री अश्विनी तिवारी मिले थे जो जौनपुर के हिन्दी कवियों पर शोधकार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें जानता हूं वे बेहोश जी के सुपुत्र के निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं ,उनका शोधकेन्द्र राजकीय महाविद्यालय यूसुफपुर गाजीपुर है।मुझे पुराने दिन याद आ गये।मैं 1974 में यूसुफपुर होते हुए खरडीहा महाविद्यालय,खरडीहा अपने सहपाठी तथा यहां के संस्कृत विभागाध्यक्ष डाॅ. राजमंगल मिश्र से मिलने गया था। मुझे यूसुफपुर तथा खरडीहा के मध्य अनेक स्थलों पर मृगों के झुंड दिखायी पड़े। अभिज्ञान शाकुन्तल का मृग प्रकरण याद आ गया। मैंने श्री शशिमोहन सिंह को अपनी पुस्तक अभिज्ञानशाकुन्तलम् एवं कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ दी। भास्कर जी ने भी अपनी पुस्तकें आपको दीं।श्री शशिमोहन सिंह का आंतरिक स्वागत कर हम लोग आगे बढ़े तो गुरुदेव उदयभान सिंह ने कहा कि यहीं तारापुर में बड़े पुत्र जो पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर में प्रोफेसर हैं का मकान है।आज मेरा पौत्र शाश्वत आया है उससे मिलूंगा।हम लोग प्रोफेसर अमित वत्स के भव्य भवन पर पहुंचे।प्रो. वत्स विश्वविद्यालय से अभी आये नहीं थे चिरंजीव शाश्वत अपने मित्रों के साथ होली समारोह के संदर्भ में शहर में कहीं अन्यत्र थे। विशाल भवन में श्री उदयभान सिंह की अकेली पुत्रवधू जो नसों की पीड़ा से परीशान थीं। ज्यों ही उनको हम लोगों के आने की सूचना मिली उन्होंने हम लोगों का भरपूर स्वागत किया। श्वसुर को देखते ही पुत्रवधू की पीड़ा जैसे समाप्त हो गयी। उन्होंने हम लोगों का स्वागत वैसे ही किया जैसा उनकी सास आदरणीया श्रीमती प्रेमलता सिंह ने किया। मुझे गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्ति याद आ गई।पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ।। थोड़ी देर में प्रो अमित वत्स भी आ गये। मकरसंक्रांति के अवसर पर प्रो वत्स अपने गांव डिहवा में खिचड़ी भोज का आयोजन कर रहे हैं और करीब एक हजार जरुरतमंदों को कंबल बांटते हैं। मुझे भी इस आयोजन में उपस्थित रहने का अवसर मिल चुका है। मुझे मानस की पंक्ति याद आ गयी,परहित बस जिनके मन माहीं,तिन्हकहं जग कछु दुर्लभ नाहीं।हम लोगों ने प्रो वत्स और उनकी सुगृहिणी को धन्यवाद दिया और कादीपुर की ओर चल पड़े।मेरे कार ड्राइवर श्री प्रगति कुमार ने चित्र खींचकर इस अवसर को अविस्मरणीय बना दिया। ग्राम डिहवा में उतरते समय गुरुदेव उदयभान सिंह ने पुनः जलपान के लिए आग्रह किया पर मैंने। दोनों हाथ जोड़कर कहा कि आज नहीं फिर जटायु जी हंसने लगे। फिर भास्कर जी अपने सारस्वत तपोभूमि में उतरे। उन्होंने रोकना चाहा पर मैंने क्षमा मांगी। आदरणीय जटायु जी अपने विश्रुत विक्रम भवन के समक्ष उतरे। मैंने उनको प्रणाम किया। अपने निवास पर आया सोचता रहा कालिदास वास्तव में कालजयी महाकवि हैं जिनकी लेखनी सदैव के लिए प्राणवंत है। सादर। डाॅ.सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु। कादीपुर सुल्तानपुर।

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