*एक अदद सुख........!*

*एक अदद सुख........!*
अगर मैं....!
इकट्ठा करना चाहूँ....
अपने बचपन के संस्मरण....
बनाकर सहेजना चाहूँ....!
बचपन से आज तक के....
अपने द्वारा अभिनीत.....
सभी सच्चे-झूठे नाटकों का,
एक श्रृंखलाबद्ध चलचित्र.....
कहाँ संभव है मित्रों.....?
याद कर पाना....सोच पाना...
या फिर....कल्पना ही कर पाना... 
हूबहू वैसा ही....बचपन जैसा ही...
बस इस कारण ही....!
मैं अक्सर गुजारा करता हूँ.....
अपना कुछ बहुमूल्य समय,
अपने से बेहद कम उम्र के....
बच्चों की टोलियों के साथ....
उकसाया भी करता हूँ उन्हें....!
उल्टी-सीधी हरकतों के लिए....
इन निश्छल शरारतों में...आज भी..
ढूँढता हूँ....अपना प्यारा बचपन....
इसी कड़ी में यह भी सोचता हूँ....!
कि....बूढ़ा-बुजुर्ग होने पर.... 
स्मरण ही कहाँ रहेंगे....?
कोई भी कहानी या संस्मरण......
बना भी नहीं पाऊँगा,
कोई भी चलचित्र.....क्योंकि...?
क्षमता भी...कम ही हो गई होगी...
उस समय मित्र....लिहाजा....!
प्रक्षेपित कर लेता हूँ....खुद को....
कुछ समय के लिए....
आसपास के बुजुर्गों के बीच....
सुनने को उनके किस्सों की सौगात,
और....कोशिशें करता हूँ....
सुरक्षित-संरक्षित रखने की....!
इन बुज़ुर्गों की हर एक ज़ुबान....
संग में....सारे के सारे जज्बात....
इसी दौर में....मैं निकालता हूँ....
कुछ समय....खुद के लिए....
खुद के अपने परिवार के लिए...
ताकि....तलाश सकूँ मैं....
इस भौतिक जगत में....!
अपने गृहस्थ आश्रम के लिए.....
हर रोज....एक अदद सुख....
क्योंकि धर्मग्रन्थों में कहा गया है...!
आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ है
आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ है

रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ

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