*फंस गया हिरन*

*फंस गया हिरन*
     एक हिरन जंगल में बड़े मजे से सुकोमल घास चर रहा था और खुब आनंदित भी था।उसे भान भी नहीं था कि मौत उसके चारों तरफ उसका इंतजार कर रही है। जबतक वह सम्हल पाता तबतक देर हो चुकी थी।वह शिकारियों के मध्य फंस गया।एक तरफ सियारों का झुंड था।एक तरफ शेरों का झुंड था।एक तरफ कुत्तों का झुंड था।एक तरफ दल दल था।ऊपर गिद्धों का झुंड मंडरा रहा था।अब वह हिरन जाये तो जाये किधर।मौत उसके चारों तरफ थी।शेर की तरफ जाये तो वो फाड़के खा जायेगा।सियार की तरफ जाये तो नीछ नीछ कर खा जायेंगे। कुत्तों की तरफ भी सियारों वाली दुर्दशा होगी।दल दल में जाता हूॅं तो मृत्यु वहाॅं भी निश्चित है।ऊपर कुलांचे मारता हूॅं तो गिद्ध मंडरा रहे हैं।यही सोचते सोचते वह दल दल के पास तक आ गया।अन्य शिकारी उसका पीछा करते चले आ रहे हैं।वह अपनी जान बचाने के लिए दल दल की तरफ खिसकता आ रहा है।आखिर में उसने निर्णय किया कि शायद दल दल से निकल जाऊॅंगा और जीवन बच जायेगा। क्योंकि अन्य जितने शिकारी थे।सबके सब अपना प्रदर्शन कर रहे थे।शेर गर्जन कर रहे थे।कुत्ते भौंक रहे थे।सियार गुर्रा रहे थे।गिद्ध भी चींचियां रहे थे।ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सभी उत्सव मना रहे थे।मनाते भी क्यों नहीं सामने सुन्दर सुकोमल शिकार जो था।हिरन उन सबसे बचना चाह रहा था।वह इस मायावी जालसाजी दुनियां में और कुछ दिन जीना चाहता था।जंगल की हरियाली का आनंद लेना चाहता था।उसने देखा दल दल शांत है।और दल दल में छलांग लगा दी।छलांग लगाने के बाद बड़ा खुश हुआ कि हम तो उन खुंखार शिकारियों से बच गये।मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित किया। क्योंकि जब छलांग लगाकर  दल दल में वह कूदा था तो थोड़ा सा धंसा था।सोंचा बच गये।मगर वह जैसे जैसे निकलने का प्रयास किया,वह धंसता गया,धंसता गया,धंसता ही गया और धंसता ही चला जा रहा है।अब वह उस दल दल से निकलने की पुरजोर कोशिश में लगा है। लेकिन आस नहीं छोड़ा है।उसे आशा है कि एक न एक दिन इस दल दल से जरूर निकलूंगा,और जीवन का आनंद लूंगा। इसलिए कोशिश कर रहा है।फंसा हुआ यह हिरन।
   पं.जमदग्निपुरी

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