*चिंगारी नहीं आग है....!*
*चिंगारी नहीं आग है....!*
सभ्यता के आरम्भ से ही....!
मनुष्य तो....घोषित तौर पर...
सामाजिक और बुद्धिजीवी प्राणी है,
अपनी बुद्धि और विवेक से वह...
करता ही आता रहा है....!
नियमों और कानूनों के लिए,
समय-समय पर विचार विमर्श....
फिर शोध के बाद लाता रहा है....
एक सुदृढ़ और सर्वमान्य निष्कर्ष..!
उद्देश्य मानव समाज का उत्कर्ष....
इस सनातनी विचारधारा से परे...
आज के दौर में मित्रों....!
चल निकली है....चिंतन की नई परम्परा...
लगभग हर कोई ही....हो गया है...
स्वनाम धन्य-स्वघोषित-बुद्धिजीवी..
और करने लगा है....सामाजिक विमर्श
लेकर अपने-अपने मानक,
अपनी-अपनी मान्यता....और...
अपना-अपना दृष्टिकोण...
व्यक्ति ख़ुद ही गढ़ने लगा है...!
परिभाषा समाज की....
लोकमंगल की...लोकरंजन की...
और....लोक कल्याण की...
खोजने लगा है वह....!
अलग-अलग शाखाएं.....और....
इसमें अंतर्निहित उपशाखाएं भी...
ताकि मिल सके उसको....
तमगा विशेषज्ञता का....!
समाज की कसौटी पर प्यारे....
ऐसा लगता है कि....
आज का...यह सामाजिक विमर्श...
एकाकी और एकांगी निष्कर्ष है....
जो विचार-विमर्श नहीं....बल्कि....
समाज को अपनी ओर से....
दिया जाने वाला परामर्श है.....
इतना ही नहीं...आप देखो तो सही..
इस समय विद्वानों की टोली में....!
अपनी-अपनी डफली....और....
अपना-अपना राग है....
गौर से देखें तो....
यहाँ सामाजिक विमर्श में भी....!
चल रहा इस समय फॉग है....और..
इस दौर का सामाजिक विमर्श....!
चिंगारी नहीं आग है.....
चिंगारी नहीं आग है.....
रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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