पहले वाली स्त्रियाँ

पहले वाली स्त्रियाँ 

मुझे पहले वाली स्त्रियाँ बेहद पसन्द थीं 
क्योंकि 
वो चुप रहती थीं 
वे विरोध नहीं करती थीं 
वो सहन करना जानती थीं 
वे समर्पण करना जानती थीं 
वो हमारे अधीन खुशी से रहती थीं 
वे हमसे हर बात की आज्ञा मानती थीं 


पहले की औरतें मुझे इसलिए भी पसन्द थीं 
क्योंकि
वे घर के अन्दर रहती थीं 
वे सड़क पर नहीं उतरती थीं 
वे हमारे बनाए नियमों को मानती थीं 
वे स्वतंत्र नहीं होना चाहती थीं 
वे आत्मनिर्भर होने की सोचती भी नहीं थीं 
वे पैसे कमाने की भी न सोचती थी 


पुरानी महिलाएँ  बहुत अच्छी लगती थीं हमें 
क्योंकि 
वे हमें श्रेष्ठ मानती थीं 
वे बराबरी की बात सोचती भी नहीं  थीं 
वे रसोई में रहकर भी भूखे पेट रहना जानती थीं 
वे अपनी शारीरिक क्षुधा के बारे में सोचना भी पाप मानती थीं ।


पहले वाली नारियाँ बड़ी भली लगती थीं हमें 
क्योंकि 
वे पढ़ना नहीं चाहती थी 
वे सपने नहीं देखती थीं
वे अधिकारों के बारे में कुछ नहीं  बोलती थी
वे ज़मीन में अपना हिस्सा नहीं माँगती थीं 


हमें आज की स्त्रियाँ बिल्कुल पसन्द नहीं हैं 
क्योंकि 
वे पढ़ने लगी हैं 
वे बोलने लगी हैं 
वे सपने देखने लगी हैं 
वे पैसे कमाने लगी हैं 
वे आत्मनिर्भर होने लगी हैं 
वे अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने लगी हैं 
वे अपने अधिकार माँगने लगी हैं 
वे अपना हिस्सा माँगने लगी हैं


आज की औरतें बिल्कुल नापसन्द हैं हमें 
क्योंकि 
वे हमसे प्रश्न करने लगी हैं 
वे घर से बाहर निकलने लगी हैं 
वे सड़क पर उतरने लगी हैं
वे हर चीज़ में बराबरी की बात करने लगी हैं 
वे विरोध करने लगी हैं 


मुझे आज की नारियाँ अच्छी नहीं लगती 
क्योंकि 
वे हमारे आधिपत्य को चुनौती देने लगी हैं 
वे हमारे बनाए नियमों को तोड़ने लगी हैं 
वे जल थल और नभ में भी लड़ने लगी हैं 
वे अंतरिक्ष में उड़ने लगी हैं 
वे रसोई को छोड़कर हमारे इलाक़ों में घुसने लगी हैं 
वे सेक्स की बात करने लगी हैं 



आज की स्त्रियाँ हमारी आज्ञा नहीं मानती हैं 
वे घर छोड़ देती हैं 
वे स्वतंत्र ,स्वच्छंद और हमारे बिना ही, हमारे बिना भी खुश रहती हैं 


ये क्या हो रहा है? 
स्त्रियाँ अब पहले जैसी नहीं रहीं, 
वे बहुत बदल गईं हैं । 

मुझसे ही प्रश्न कर रही हैं कि 
हम तो बदल रहे हैं 
पर तुम कब बदलोगे?

कवि सन्तोष कुमार झा 
13 फ़रवरी, 2026

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