रामजीत मिश्र की नई पुस्तक"विविधा" पर दो शब्द : एस.बी.उपाध्याय

रामजीत मिश्र की नई पुस्तक
"विविधा" पर दो शब्द : एस.बी.उपाध्याय
पुस्तक समीक्षा। अक्सर अंतर्मुखी, गंभीर, सौम्य मृदुभाषी, कम बोलनेवाले किन्तु हॅंसमुख व्यक्तित्व रामजीत मिश्र की हॅंसी के पीछे पीड़ाओं का एक हाहाकारी समंदर भी है, यह उन्हें पढ़ कर ही जाना जा सकता है। उनकी कविताओं को पढ़ना किसी अनुभव से गुज़रने जैसा है। शर्त मगर ये है कि आप एक पंक्ति पढ़ कर थोड़ा ठहर लें, वरना शिल्प के चमत्कार से बिना अनुभूति के गुज़र जाएंगे।
यहाॅं आपको अनुभव और शिल्प की तेल बाती का उजास मिलेगा। वह ग़ज़ल हो, शेर हो, मुक्तक हो या छंद या दोहे हों।
थोड़ा हल्के मूड में उन्होने एक कजरी भी लिखी है, और भोजपुरी में लिखी ग़ज़लों में बिसरते हुए गॅंवई शब्दों तथा महक की अनुभूति दी है।
    हिंदी और भोजपुरी ग़ज़लों में उनकी दबी हुई पीड़ा उभर उभर आती है। इन पीड़ाओं से जंग ही एक बुझी हुई चिता के बाद का जीवन है।
     मुक्तक दो तरह के होते हैं। एक तो वे जो तत्काल चौथी पंक्ति में चमत्कार करते हैऔर तालियाॅं खा कर बैठ जाते हैं। अर्थ की खास गहराई का आग्रह वहाॅं नहीं होता, वे एक संदेश या बात कह जाते हैं।
     दूसरे वे जो अर्थ से भरे होते हैं, चमत्कार की परवाह से निर्लिप्त। उनमें न तो चमत्कार का आग्रह होता है न वैसे आकर्षण की योजना।
      रामजीत मिश्र के मुक्तक, छंद, शेर, इसी दूसरी कोटि के है जहाॅं हर पंक्ति अर्थ भाव बोझिल है। वे पढ़ने और मनन के योग्य हैं। हर पंक्ति स्वयं में एक सुंदर अनुभूति या संदेश है, जीवन के अनुभव समंदर से बीन कर निकाले गए मोती जैसा।

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