*युजीसी ऐक्ट और किसान का गन्ना*

*युजीसी ऐक्ट और किसान का गन्ना*
         ये कहानी बहुत पुरानी है।एक किसान था।उसकी गन्ना की खेती बहुत अच्छी थी।नाई हरिजन व ब्राह्मण तीनों जा रहे थे।देखे गन्ना बड़ी सुन्दर व रसीली है। तीनों ने निर्णय किया कि चलो गन्ना तोड़कर चूसी जाय।और तीनों पिल पड़े गन्ना तोड़ने में।इतने में लाठी लिए किसान पहुॅंच गया और तीनों को पकड़ लिया।पकड़ तो लिया मगर किसान को भय भी है कि कहीं तीनों एक साथ मिलकर मारने न लगें।इसलिए उसने युक्ति से काम लिया।पहले हरिजन से कहा कि पंडित जी ने तोड़ा तो तोड़ा।पंडित जी पूजा पाठ करते हैं हम सबके कल्याण के लिए हवन यज्ञ करवाते हैं। भगवान से हमारी सुख सुविधा के लिए प्रार्थना करते हैं। शर्मा जी हैं, उन्होंने तोड़ा तो कोई बात नहीं है।ये भी हजामत आदि करते हैं।हमारे रूप को संवारते हैं।गाहे बगाहे पानी भी पिलाते हैं।लेकिन हरिजन तूॅं क्यों तोड़ा।और लगा उसे लतियाने।उसको लतियाने के बाद किसान शर्मा जी को समझाते हुए लतियाया।अंत में पंडित जी को जमके लतियाते हुए बोला कि आप तो श्रेष्ठ थे।आप क्यों नहीं रोके।आपको इन लोगों को समझाकर गलती करने से रोकना चाहिए था।मगर आप तो खुद ही गलती कर रहे थे तो रोकते कैसे। इसलिए पंडित जी की भी धुनाई विधिवत हुई।किसान अकेला वो तीन, तीन बिरादरी से थे। इसलिए किसान पहले तीनों में फूट डाला।और बारी बारी से तीनों को पीटा।कहने का मतलब ए कि नं.सबका आयेगा।बचेगा कोई नहीं।
          वैसे ही आज की सरकारें हम आम आदमियों को को बांटकर हम पर राज कर रही हैं।कभी हिन्दू मुसलमान तो कभी सवर्ण दलित।कभी दलित पिछड़ा।आप सब जब गौर करेंगे तो पायेंगे कि पार्टियां हम सबको आपस में लड़वाकर अपना उल्लू सीधा कर रही हैं।और हम मार खा रहे हैं।और एक दूसरे को मार खाते देख मजे ले रहे हैं।जब महादलित दलित को फंसाता है तो पिछड़ा व सवर्ण खुश होता है।जब दलित पिछड़े को फंसाता है तो सवर्ण खुश होता है।और जब सभी मिलकर सवर्ण को फंसाते हैं तो सभी खुश होते हैं और सवर्ण दुखी होता है।इन सबको झगड़े में फंसाकर नेतागण लोग मजे ले रहे हैं और हम सब कुत्ते बिल्ली जैसे लड़ रहे हैं।इन नेताओं के चंगुल से यदि निकलना है और सुरक्षित रहना है तो हम सबको एक इकाई बनकर रहना होगा।तभी हम और हमारा देश सोने की चिड़िया बन पायेगा।अन्यथा ऐसे ही हम सब लड़ भिड़ कर खप जायेंगे।और नेतागण मजे करेंगे नाती पोता सहित। किसान के गन्ने की तरह।
पं.जमदग्निपुरी

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