102 वर्ष की उम्र में ब्रह्मलीन सच्चिदानंद स्वामी का जौनपुर से रहा गहरा लगाव

102 वर्ष की उम्र में ब्रह्मलीन सच्चिदानंद स्वामी का जौनपुर से रहा गहरा लगाव
जौनपुर। विश्व भर में फैले लाखों भक्तों के लिए भगवान की तरह पूजे जाने वाले सच्चिदानन्द स्वामी धारकुंडी महराज के ब्रह्मलीन होने की खबर का पता चलते ही उनके श्रद्धालुओं में शोक की लहर छा गई। सैकड़ों श्रद्धालु उनके अंतिम दर्शन के लिए मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थित धारकुंडी आश्रम के लिए प्रस्थान कर दिया। स्वामी जी ने शनिवार की रात मुंबई के बदलापुर स्थित आश्रम पर नश्वर शरीर को त्याग गोलोक सिधार गए। बताते हैं कि वे 102 वर्ष की उम्र में शरीर का परित्याग किए हैं।
परमहंस महराज के तीन शिष्यों,स्वामी अड़गड़ानंद और अनुसुइया महराज में सबसे बड़े सच्चिदानंद स्वामी धारकुंडी महराज थे। उनका जौनपुर से विशेष लगाव था। लगभग तीन दशक पूर्व दौलतपुर गांव निवासी व रेलवे विभाग में सतना स्टेशन पर स्टेशन मास्टर के पद पर तैनात रहे ताल्लुका दूबे उनके आश्रम में गए थे। स्वामी जी से इस कदर प्रभावित हुए कि नौकरी और परिवार छोड़ उन्हीं के शरणागत होकर रह गए। जिन्हें दूबे बाबा के नाम से जाना गया। इसी तरह महमदपुर गुलरा गांव निवासी जगदीश पांडेय घर बार छोड़कर आश्रम में ही रह गए। उन्हें जगदीश बाबा की उपाधि मिली। वर्ष 1985 में धारकुंडी महराज का आगमन महमदपुर गुलरा और दौलतपुर गांव में हुआ था। तभी से यहां उनके हजारों श्रद्धालु बन गये। प्रत्येक गुरुपूर्णिमा को यहां से हजारों श्रद्धालु धारकुंडी आश्रम पहुंच उनका दर्शन पूजन करते चले आ रहे हैं। उनके गोलोक सिधारने की खबर से सभी श्रद्धालुओं में शोक छा गया। उनके भक्तों में शामिल राजा हरपाल सिंह महाविद्यालय के प्रबंधक कुंवर जय सिंह के अनुसार उनका दर्शन करने मात्र से ही शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो उठता था। ऐसे संतों का दर्शन दुर्लभ होता है। 
धारकुंडी आश्रम के पीछे स्थित अघमर्षण कुंड का उल्लेख महाभारत के युधिष्ठिर और यक्ष संवाद की पृष्ठभूमि के रूप में होता है। यही कारण है कि यह स्थान न केवल श्रद्धालुओं बल्कि इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों को भी आकर्षित करता है।  स्वामी जी 22 नवंबर 1956 को यहां आए और पहाड़ की उसी गुफा में निवास करने लगे, जहां पहले एक खूंखार शेर रहा करता था। चमत्कारिक रूप से शेर ने गुफा छोड़ दी और वही स्थान बाद में विकसित होकर धारकुंडी आश्रम बन गया। स्वामी जी ने अपने अतीत की जानकारी किसी को नहीं दी। उन्हें निशानेबाजी और सेना के कोड वर्ड्स का गहरा ज्ञान था। कुल मिलाकर उनका संपूर्ण जीवन एक रहस्यमय आध्यात्मिक जीवन रहा, जिसे समझ पाना बहुत मुश्किल है।

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