*मरकहवा रिश्तेदार.....!*

*मरकहवा रिश्तेदार.....!*

सभी जानते हैं प्यारे.....!
रिश्तेदारों से हमको,
मिलता है प्यार-दुलार....
कुछ रिश्ते ऐसे होते,
माँगो दस तो...देते एक हजार...
खुश होकर हम भी,
पास नाचते इनके बारम्बार..
पर....यह भी सच मानो प्यारे.....!
कुछ रिश्ते ऐसे भी होते,
जो देते अक्सर हम सबको दुत्कार..
मन ही मन हम गुस्सा होते,
गाली देते....इनको हजार-हजार....
इन बिगड़ैल किस्म के रिश्तेदारों को
घर आते ही मित्रों...
होती है बीड़ी-सुरती की दरकार....
सामने इनके पड़ते ही.....!
गिनती और पहाड़ा संग...प्रश्नों की..
झट से कर देते ये बौछार....
कुल रिश्तेदारों में प्यारे....!
चमड़ी होती इनकी सबसे मोट
घर में आते ही इनके,
घर में होती अक्सर झोटम-झोट....
वापस जब जाते ऐसे रिश्तेदार...
घर की सभी बहुरिया,
किस्सा कह-कह इनके....!
हो जाती हैं लोटम-पोट.....
जो आवें कभी ये अपने वाहन से,
फिर तो उनके नखरे कई हजार... 
ख़ुद की बड़ाई के मित्रों....!
हरपल किस्से रखते ये तैयार...
पल में सबकी औकात बतावें,
ख़ुद को मानें खूब चतुर-होशियार...
भोजन में भी....ये मीन-मेख निकारैं
बिस्तर माँगे अलबेला....!
भले फटीचर जैसा मित्रों,
रखे हुए हों खुद का चोला....
गौरतलब एक बात....और है मित्रों
भले बात-बात पर पहुँचायें ये चोट
पर ऐसे रिश्तेदार तो भइया....!
घर घुसते...अक्सर ही बेरोक-टोक..
भाषा-बानीऔर जुबान पर इनके,
नहीं दिखती है कोई रोक....
वक्त-बेवक्त ही मित्रों....!
ये सबको ही....देते टोंक....
अच्छी से अच्छी चीजों में भी,
इनको दिखता है खोट....
बात कटै ना कोई इनकी...
ना माने इनको कोई छोट....
इस कारण ही प्यारे....ये तो....
बिछाए रखते हैं....हरदम गोट....
चुगली के गुगली तो मानो....!
इनकै जन्मसिद्ध अधिकार....
पारंगत तो होते ही इसमें...फिर भी,
रोज़ लगाते इसमें धार....
अचरज़ की यह बात सुनो रे भइया,
सब जानै और सब मानै कि....!
इन लोगों का नहीं कोई आधार....
राय से इनके...काम किया जिसने
हुआ उन सब का ही बंटाधार....
इतने सब के बाद भी भइया....!
गाँव-देश और समाज की अपने,
महिमा देखो अपरम्पार....
निंदा की ही खातिर.... पर....!
इन रिश्तेदारों को भी देता है सत्कार
भले पीठ के पीछे इन रिश्तेदारन को
सब कहते हैं...मरकहवा रिश्तेदार...
सब कहते हैं...मरकहवा रिश्तेदार...

रचनाकार......
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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