*अजनबी रिश्ते* ( लघुकथा )श्रीमती सिंधवासिनी तिवारी 'सिंधु'

*अजनबी रिश्ते* ( लघुकथा )
श्रीमती सिंधवासिनी तिवारी 'सिंधु' 

सत्या को मुंबई में आए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे। उसने यहाँ के बारे में सुना बहुत कुछ था लेकिन देखा कुछ नहीं । उसके मन में भी मुबई घुमने की लालसा जगी या यूं कहिए अपने पति के साथ कही बाहर अकेले जाने की मीठी अभिलाषा जो हर नई नवेली दुल्हन के मन में होती है।
सासु माँ के सामने उसने दर्शन करने जाने की इच्छा व्यक्त की। सासु माँ ने कहा कि यदि तुम्हारा पति जाए तो लेकर जाओ। मैंने कहाँ रोक रखा है??घर में सबसे सलाह-मशवरा के बाद तय हुआ कि रविवार के दिन मम्मी-पापा को भी दावत में जाना है तो सत्या का पति बाबू, सत्या को लेकर जा सकता है क्योंकि उसके माता-पिता घर पर नहीं रहेंगे तो उनके सेवा टहल की जिम्मेदारी से वह मुक्त रहेगी।
बाबू एक आदर्श किस्म का बेटा था जिसने प्रथम रात में ही अपनी पत्नी को यह बता दिया था कि उसने शादी अपने माता-पिता के लिए किया है। सत्या इस सत्य पर बहुत विचार- चिन्तन करने के बाद भी इस तर्क को समझ नहीं पाई कि बाबू को ये अधिकार कहाँ से प्राप्त हुआ कि सत्या के जिन्दगी का फैसला वह कर सकता है। वह उसका मालिक है और वह बिकने वाली वाली वस्तु। खैर, आज तो प्रश्न दूसरा था। उसे जाना था सिद्धिविनायक, बप्पा से मिलने। थोड़ी शिकायत करने, थोडा अपना दर्द बांटने। घर से उसके सास-ससुर, पति और वह अपने छोटे से बच्चे के साथ गई। सासु माँ उसे अपने साथ लेकर महिला बोगी में चढ़ गई और बाबू जेन्स डिब्बे में। सासु मां सत्या को सिखाती-पढ़ाती रही कि आते समय बच्चे को बाबू को दे देना। तुम बच्चा लेकर चढ़ नहीं पाओगी। उनकी हर बात पर सिर हिलाती सत्या एक अनुशासन प्रिय छात्रा लग रही थी। हिदायत भी मिल गई, दर्शन करके सीधे घर आना। घूमने-फिरने मत लगना। घर जाकर बाकी सभी के लिए भोजन भी बनाना है। सत्या ने हामी भर ली। दादर स्टेशक आ गया और सत्या अपने बच्चे के साथ उतर गई।
सत्या वही खड़ी उस बोगी को निहारती रही जिसमें बाबू चढ़ा था लेकिन बाबू नहीं दिखा। गाडी चल दी और वह इधर-उधर देखती रही कि कहीं बाबू नजर आ जाए।
उसकी धड़कने बढ़ गई। अजनबी शहर। पहली बार घर से बाहर निकली थी।  गोद में एक नन्हा-सा बच्चा था। वह असहाय बनी चारों ओर नजर घुमा रही थी कि कहीं से बाबू आए और उसे ठप्पा बोल दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह पन्द्रह-बीस मिनट तक इंतजार करती रही। उसे बप्पा से शिकायत तो थी ही,  अब तो उसका हृदय पीड़ा से ‌भी भर गया था। इस पीड़ा को झेलने का सामर्थ्य बप्पा के सिवाय और किसी में नहीं था। हर पल अपना अपमान और तिरस्कार झेलना उसे भारी लग रहा था।
“कहाँ जाना है बेटी?” पीछे से एक अवाज आई।
सत्या चकपका कर इधर-उधर देखने लगी। एक महिला उसके पास आ चुकी थी।
सत्या –“कहीं नहीं।"
महिला-“लगता है किसी का इंतजार कर रही हो??”
सत्या –“जी!”
महिला -“जरा पीछे होकर खड़ी हो जाओ। अभी ट्रेन आएगी । चढ़ने-उतरने वालों से चोट लग सकती है।”
सत्या – “ओह! सही कहा आपने।”
 वह पीछे हट गई। महिला ट्रेन के रुकते ही इधर-उधर नजर घुमाकर देखती रही।
सत्या – “आण्टी!!  आप किसी को ढूढ़ रहीं हैं।”
 महिला- “हाँ, मेरी फ्रेंड मेरे साथ चढ़ नहीं पाई थी तो यह पीछे वाली ट्रेन से आएंगी। हम दोनों को सिद्धी विनायक जाना है।”
सत्या – “ओह!! मेरा साथी भी लगता है चढ़ नहीं पाया था।”
वह भी उम्मीद की नाजरों से देखने लगी फिर कुछ सोचकर निराश हो गई क्योंकि अब तक तीन ट्रेनें जा चुकी थी लेकिन बाबू नहीं आया था। वह मन ही मन सोचने लगी। ये लोग मंदिर जा रही हैं । क्यों न मैं भी इनके साथ ही चल लूं। 
उस महिला की दोस्त उतर आई। सत्या उनकी ओर देखने लगी।
 महिला –“क्या बात है बेटी…?? कुछ कहना चाहती हो??"
 सत्या - "आंटी ! मुझे भी दर्शन के लिए जाना है। यहाँ से किधर जाना है? पास में है या दूर है सिद्धीविनायक मंदिर।”
महिला – “हमारे साथ चलो। हम भी वहीं जाएंगे।”
वे महिलाएं सत्या को अपने साथ लेकर चल दी। स्टेशन से बाहर निकलने पर सिद्धी विनायक के लिए टैक्सी ली और वहां पहुँच गए। लाइन में लगने के बाद, भीड में वे दोनों महिलाएँ कहाँ खो गई पता नहीं चला। सत्या का दर्शन हो गया। बप्पा को देखकर सत्या मुस्कुराई। उसने मन ही मन कहा-“बप्पा क्या मुझे कुछ कहने की जरूरत है?”
उसे लगा जैसे बप्पा भी मुस्कुरा रहे हैं। नहीं, मैं सब समझ गया हूं।
मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद उसका मन शांत हो चुका था। उसका आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था।
पहले उसने सोचा कि वह अपने अपमान का बद‌ला ले। बाबू के घर न जाकर अपने घर चली जाए। उसके पर्स में चालू टिकट खरीदने के पैसे तो थे ही,  जो उस‌के मायके से मिले थे। बाबू ने उसे एक रुपया थमाया नहीं  और सास ने बाबू की जिम्मेदारी पर छोड़ दिया था। छोड़ी हुई स्त्री की जो मनोदशा होती है। वही दशा इस समय सत्या की थी। बहुत सोचने-विचारने के बाद उसने अपने ससुराल जाने का निर्णय लिया क्योंकि यदि वह अभी जाएगी तो उसके ससुराल वाले झूठा आरोप लगा सकते हैं कि वह भाग गई और बाबू की गलती छुपा ली जाएगी।
अकेले टैक्सी में जाना उसे सेफ नहीं लगा तो उसने बस से दादर स्टेशन जाने का फैसला लिया। वह बस में चढ़ी तो बहुत गर्दी थी। एक हाथ में हैंड बैंग और दुसरे हाथ में बच्चा। बड़ी मुश्किल से वह खड़ी थी । अचानक एक महिला ने उसे छूकर इशारा किया कि यहां बैठ जाओ। वह महिला भी अधेड़ थी। सत्या ने अपने बच्चे को पकड़ने के लिए कहा लेकिन उसका बच्चा उस  महिला को अजनबी समझ रहा था और उसके पास जाकर रोने लगा। अंततः वह बैठ गई और वह भद्र महिला खड़ी हो गई। अगले स्टॉप पर उसके बगल की सीट वाले सज्जन उतरे तो वह महिला भी उसके बगल में बैठ गई। 
महिला – “दर्शन करने आई थी?” 
सत्या - "हाँ।"
महिला – “अकेले बच्चे को लेकर ट्रेवलिंग मुश्किल होता है। किसी के साथ ही निकला करो। आज तो संडे है। तुम्हारा पति साथ नहीं आया।"
सत्या- “जी! उनको घर पर कुछ जरुरी काम था और मेरा मन आज ही बाप्पा के यहाँ हाजिरी लगाने की थी इसलिए मैं आ गई।"
न चाहते हुए भी उसके आँखों में हल्की नमी आ गई थी। उस महिला ने अपना कार्ड निकाला और सत्या को दे दिया। मैं भांडुप में रखती हूँ कोई जरुरत होगा तो मुझसे कॉन्टेक्ट कर सकती हो बेटी!"
सत्या – “ओके आंटी!! आप भी यहां दर्शन के लिए आई थीं??"
महिला – “नहीं, अपनी बेटी के घर आई हूं। कुछ दिन उसके साथ रहूंगी फिर जाऊंगी।”
वह बस आगे जाने वाली थी इसलिए सत्या को स्टेशन से एक स्टाप पहले ही  उतरना पड़ा। बच्चे को गोद में लेकर चलने के कारण वह हॉफने लगी। वह भी तो कृशकाया ही थी।
उसके बगल से गुजरते हुए एक आदमी से उसने पूछा-“स्टेशन का रास्ता किधर से है?”
 उस आदमी ने जवाब दिया–“ मैं स्टेशन ही जा रहा हूं। मेरे साथ चलो बेटी!!”
वह देखने में भला आद‌मी लग रहा था। सत्या उसके पीछे-पीछे चल दी। बच्चे को गोद लिए वह चलते-चलते बहुत थक गई थी। कदम मद्‌धम होकर लड़खड़ाने लगे थे। उसके हांफने की आवाज उस आदमी के कानों में पड़ी। वह पीछे मुड़कर देखा। सत्या की हालत देखकर शायद वह द्रवित होकर स्नेह भाव से बोला- “बहुत थक गई हो बेटा!! दो तुम्हारा बच्चा मैं ले लेता हूँ।”
सत्या संकोच कर रही थी। बार-बार आग्रह करने पर उसने अपना बच्चा दे दिया। वह आदमी तेजी-तेजी चलने लगा और शंका से घिरी सत्या उसके पीछे-पीछे चलने लगी। वह डर गई थी कि कहीं वह अजनबी उसका बच्चा लेकर गायब न हो जाए । वह खुद को कोसने लगी।
वह अजनबी भला आदमी था। उसने सेंट्रल लाइन के लिए जाने वाली ट्रेन में उसे बैठाकर और चेताकर चला गया कि बेटा अपना ख्याल रखना। सत्या शाम को गोद में बच्चा लिए घर पहुंच गई। आज भी वह उन अजनबी लोगों और कुछ समय के लिए बने उन अजनबी रिश्तों को याद करती है तो मन प्रेम और श्रद्धा से भर जाता है।
श्रीमती सिंधवासिनी तिवारी 'सिंधु' 
मुंबई महाराष्ट्र 

 *मेरी जान* (लघुकथा)
अक्सर सत्या का पति उसे लुभाने  के लिए कह दिया करता था कि तुम मेरो जान जान हो लेकिन यह बात दोनों को मालूम थी कि इस बात में कोई जान नहीं था। परिवार की बात आते ही सही-गलत, न्याय-अन्याय भला-बुरा सब बातें दरकिनार करते हुए वह एकतरफा अपने परिवार की ओर हो जाता था। फिर कहाँ की सत्या कहां का बाबू और कैसा उसका प्रेम। जान होना तो दूर वह जानी दुश्मन बन जाती।
सबके सामने ही उसके पक्ष को जाने बिना ही वह उसे भला-बुरा बोलने में 
 थोड़ा भी संकोच  नहीं करता और प्यार-मोहब्बत के सारे कसमें वादे काफूर हो जाती।
प्यार तकरार में झूलते-झूलते  दो साल बीत गए।अब दोनों की श एक खूबसूरत-सी पूरी धरती पर उतर आई। दोनों की ज़िंदगी में सुखद बदलाव के बाद ठहराव भी आ गया।

बच्ची कभी रोती तो यह चिल्ला उठता । अपनी पत्नी को बोलता, “सब काम छोड़ो, सबसे पहले परी को संभालो।”  सत्या यदि उस समय अपने सास-ससूर की सेवा में भी होती तो वह पहले परी का काम करने को कहता। उसके इस व्यवहार के लिए उसे कई बार अपने माता-पिता के ताने भी सुनने पड़ते, “ एक तुम्ही दुनिया में बाप बने हो, सबके पास बेटी है। इतना मोह लगाते हो एक दिन पराए घर ही तो जाएगी। तब कैसे रहोगे। वहाँ न जाने कैसा व्यवहार करेंगे ससुराल वाले?? इसलिए तुम्हारी दादी कहती थी बेटियों को  लाड़-प्यार के साथ-साथ, कभी-कभी डॉंट फटकार भी लगानी चाहिए। ताकि उनको आदत रहे और ससुराल की डांट फटकार से सदमा न लगे।” 
सत्या वहीं खड़ी सब बात सुन रही थी। उसकी आँखे डबडबा आई।  उसकी सास कड़वा 
लेकिन सत्य बोल रही थी। वह भी अपने माँ-बार की जान है। अपने घर में सबकी लाडली। एक शब्द भी कभी किसी ने अपशब्द नहीं बोला।  लेकिन यहां ससुराल में प्यार के दो बोल  सुनने के लिए वह तरस जाती है। 
बाबू की नजर सत्या पर पड़ी।  वह अपने  जजबात रोक न सका और अपने कमरे में जाकर मूंह ढककर रोने लगा। सत्या के रूम में आते ही वह उससे लिपट लगा। किसी बच्चे की तरह बिलखने
सत्या, " अभी परी की विदाई में बहुत साल है। कुछ आंसू उस समय के लिए बचा कर रखो।" 
बाबू – “सॉरी सत्या!! मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया आज तक । मैं सिर्फ अपने बारे में और अपने माँ-बाप के बारे में सोचता रहा। मुझे उनका प्यार याद रहा। मुझे सिर्फ यही लगता रहा कि मैं अपने माता-पिता की जान हूं। भूल गया कि तुम्हारे माता-पिता ने भी तुम्हें पाला-पोसा है। तुम भी उनकी जान हो। आई एम सॉरी । अब कभी तुम्हारा अपमान नहीं करूँगा।
सत्या, "कोई बात नहीं। जब जागो तभी सबेरा  लेकिन एक बात बताओं जो तुम कहते हो कि मैं तुम्हारी जान हूँ वह बात सत्य है या,,,,।”
बाबू – “मैं तुम्हें प्यार करता हूं लेकिन मम्मी की बात आती है तो तुम न जाने क्यों पीछे हो जाती हो, सच कहूँ  तो अब मेरी परी के आगे मुझे कोई नजर नहीं आता। शायद मम्मी भी उसके बाद ही आती है।"
सत्या- “चलो यह भी ठीक है। भले  हम दोनों एक दूसरे के सच्चे वाले जान न हो लेकिन हम दोनों की जान एक ही है, "हमारी परी।"

श्रीमती सिंधवासिनी तिवारी 'सिंधु' 
मुंबई महाराष्ट्र

Comments

Popular posts from this blog

*एन के ई एस स्कूल के विद्यार्थियों ने जीता कबड्डी प्रतियोगिता*

बेस्ट टीचर निलिमा चौधरी यांची स्वेच्छा निवृत्ती

श्रीमती गुजना इंग्लिश हाई स्कूल का 45वां वार्षिकोत्सव धूमधाम से संपन्न