*आँसू.....!*
*आँसू.....!*
जीवन के रंगमंच पर अभिनीत....!
हर एक अभिनय में....
महत्त्वपूर्ण होते हैं °आँसू°....
ये °आँसू° ही....पैमाना होते हैं....
यह तय करने का कि...इस दुनिया में
कौन है कमतर और कौन है बेहतर..
खूबसूरती कहूँ या कहूँ कुछ और...!
ये °आँसू°...खुशी के हों या गम के..
सूख ही जाते हैं...कुछ देर के अंदर..
महज एक संयोग मत मानो इसे,
विश्वास इस बात का जानो इसे....
कि....खुशी हो या गम.....
ज्यादा हो....या हो कम....
यहाँ... किसी के पास भी....!
नहीं होता है कोई समन्दर....
बिखर जाते हैं लोग यहाँ....!
कभी किसी के "आँसू" देखकर....
बिफर भी जाते हैं लोग यहाँ....!
कभी किसी के "आँसू" देखकर
कुछ अजीब सी चीज है ये "आँसू"...
बेबसी हो,गम हो या हो खुशी....!
आसानी से भाँप जाते हैं लोग....
किसी के "आँसू" देखकर....
"आँसू"...दुनियावी भूल-भुलैया का.,.
दस्तूर है प्यारे....!
यहाँ कुछ लोग "आँसू" बहा जाते हैं,
किसी के इशारों को भाँपकर....
कुछ मजबूर इतने हो जाते कि
चुपचाप गिराते हैं "आँसू"....!
मुँह पूरा अपने हाथों से ढाँपकर...
"आँसू" का किरदार देखकर प्यारे ...!
बुज़ुर्गों ने कहा ठोककर....
जो "आँसू" ना हो इस जहाँ में,
कौन मानेगा भगवान को जादूगर...
औऱ....तय कैसे हो पाएगा यहाँ.....!
कि कौन है बाजीगर-मदारी...और...
कौन है....मुकद्दर का सिकंदर....?
इन बातों पर विचारकर प्यारे....!
ब्रह्मराक्षस बन....तू एक काम कर...
इन "आँसुओं" पर गहन शोध कर....
विषय यह सोचकर कि.....!
क्या मिला भगवान तुमको....?
आँखों में यह...खारा पानी भरकर...
और...क्या मिला तुझको मनुष्य....?
नाम इसका..."आँसू" रखकर....
बस इसी विषय पर.....!
तू अपना शोध पूर्ण कर....
निष्कर्ष शोध का...चाहे जो रहे प्यारे
मगर विश्वास है....!
इस बात का पूरा मुझे....
कि हर कालखण्ड में....
इन "आँसुओं" के दम पर ही...
रंगमंच पर कोई मनुष्य.....!
उत्तम अभिनय को....
हो सकेगा तत्पर...
उत्तम अभिनय को....
हो सकेगा तत्पर....
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
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