ब्रह्म विद्या से ही मानव जीवन का उत्थान सम्भव-- आचार्य डॉ योगेंद्र यज्ञीक
ब्रह्म विद्या से ही मानव जीवन का उत्थान सम्भव-- आचार्य डॉ योगेंद्र यज्ञीक
महरौनी(ललितपुर)--- महर्षि दयानन्द सरस्वती योग संस्थान आर्य समाज महरौनी के तत्वाधान में वैदिक धर के सही मर्म को जन जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य द्वारा पिछले एक वर्ष से आयोजित व्याख्यान माला के क्रम में मुंडकोपनिषद एक चिंतन विषय पर मुख्य प्रवचन कर्ता आचार्य डॉक्टर योगेन्द्र यज्ञीक गुरूकुल नर्मदापुरम व सारस्वत अतिथि डॉक्टर आनंद कुमार आईपीएस राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्र निर्माण पार्टी ,विशिष्ठ अतिथि वेद प्रकाश शर्मा आईपीएस सेवानिवृत्त पुलिस महानिरिक्षक भोपाल एवं अध्यक्षता सुरेंद्र आर्य पँछी पुन्हाना व संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य के संचालन में सम्पन्न हुआ।
मुख्य प्रवचन कर्ता आचार्य डॉ योगेन्द्र यज्ञीक ने मुण्डक उपनिषद एक चिंतन विषय पर बोलते हुए कहा कि शौनक ने अंगिरा ऋषि से पूंछा कि वह कौन सी वस्तु है जिसके जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता हैं कहा कि वह दो विधाएं है जिन्हें परा विद्या कहा है जिसके द्वारा ब्रह्म का ज्ञान होता हैं। ब्रह्म के गुण बताते हुए कहा कि वह इंद्रियों से प्राप्त नही होता क्योंकि वह इंद्रियों का विषय नही हैं उसके आँख- कान नही, हाथ-पाँव नहीँ, वह नित्य हैं,विभु हैं,धीर लोग परा विद्या से ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेते हैं वह जगत का निमित्त कारण हैं।जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाले का सृजन करती है मगर जालें से अलग रहती है इसी प्रकार वह ब्रह्म अपने अंदर मौजद जगत का उपादान कारण प्रकृति से इस ब्रह्मांड का सृजन कर्ता है।
प्रत्येक मानव को दो प्रकार के क्रम करने चहिये एक नित्य कर्म,दूसरा नैमित्तिक कर्म,नित्य कर्म महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पंच महायज्ञ का विधान किया जो नित्य करने योग्य हैं दूसरा नैमित्तिक अर्थात अमावस्या, पूर्णमासी,चातुर्मास आदि । प्रज्ज्वलित अग्नि में यज्ञ आदि उक्त कर्मो के करने से सप्त लोकों की प्राप्ति होती हैं।
सारस्वत अतिथि डॉ आनंद कुमार आईपीएस राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्र निर्माण पार्टी ने कहा कि महर्षि दयानन्द ही पहले ऋषि हुए जिन्होंने उपनिषदों को त्रैत आधार माना जबकि इतर जितने आचार्य हुए किसी ने द्वैत,तो किसी ने अद्वैतवाद सिद्ध करने की कोशिश की।
विशिष्ठ अतिथि वेद प्रकाश शर्मा आईपीएस सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक भोपाल ने कहा कि उपनिषदों में दो मार्गों का वर्णन है प्रेय मार्ग अर्थात अपरा विद्या,श्रेय मार्ग परा विद्या अर्थात ब्रह्म की प्राप्ति । संसार से कुछ चाहिए तो सकाम कर्म करें और यदि ईश्वर से कुछ चाहिए तो निष्काम कर्म करें।
अध्यक्षता करते हुए सुरेंद्र आर्य पँछी पुन्हाना प्रधान आर्य समाज सत्य सदन हरियाणा ने कविता के माध्यम से कहा कि" पाखंड-खड़नी की आज फिर तलाश है"।
सुप्रसिद्ध भजनोपदेशिका श्रीमटिवकविता आर्या ने "हमको रास्ता दिखा दो प्यारे प्रभु,सबकी विगड़ी बना दो प्यारे प्रभु" भजन सुनाया।
वेविनार में अभिलाष चंद्र कटियार बैंक अधिकारी,बाबू सिंह महरौनी, जयपाल सिंह बुन्देला मिदरवाहा,ध्यान सिंह यादव मिदरवाहा, रामकुमार राजपूत भैरा, देशराज राजपूत शिक्षक भैरा,राज्यपाल पुरुष्कृत शिक्षक चन्द्रभान सेन पन्ना,विवेक सिंह शिक्षक गाजीपुर,चन्द्रकान्ता आर्या चंडीगढ़,ईश्वर देवी,डॉ युधिष्ठिर त्रिवेदी अमेरिका,सुरेश गौतम अमेरिका,शिक्षिका द्वय सुमन लता सेन व आराधना सिंह सहित सम्पूर्ण विश्व से आर्यजन जुड़ रहे हैं।
संचालन संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य एवं आभार मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ ने जताया।
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