" किसे चुनूं "(कविता)-- डाॅ. अनिल 'आबशार'
" किसे चुनूं "(कविता) -- डाॅ. अनिल 'आबशार' त्रेता के बाद द्वापर,कलियुग इसके बाद आता है. एक क्रमबद्ध यात्रा है काल की या यूं कहें एक ही जगह ठहरे हुए अनादि और अनंत काल की अकल्पनीय विशालता में दौड़ता भागता छिपता उभरता उछलता कूदता फिर हांफता थकता यात्रा करता है जीवन। जीवन चलता है रूप बदलता है नए नए रंगों में ढलता है साथ साथ बदलते हैं मान्यताएं,मूल्य,नैतिकता और आदर्श भी। पिता के आदेश को बिना किसी विचार के, हित अहित,पक्ष प्रतिपक्ष को सोचे पालन करना- तत्क्षण, धीरे धीरे बदल कर तथाकथित दुःखनाश की ओट में साधन पथ अपनाकर त्याग देना जरा जीर्ण पिता की चाहतों आशाओं को ठोकर मार कर निकल जाना बन जाती हैं। जहां राजसत्ता छोड़ी ही नहीं जाती अयोध्या में बाँटी भी जाती है किष्किंधा और लंका में। एक व्यक्तित्व जिसकी शीतल छाया में बंदर भी शिल्प तकनीक सीखते हैं उद्यम करते हैं। नारी सम्मान के लिए युगों युगों की उपेक्षा को लात मार देना या सर्वस्व दांव पर लगा देना भाई के प्राण भी। लोक मंगल की सद्वृत्तियां जहां अस्थियों की ढेर बनी पड़ी हों उनकी वैरी कुवृत्तियों के सर्वनाश का संकल्प। व...