खत्म होती सहनशीलता, संवाद पर भारी पड़ता अपराध–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार
खत्म होती सहनशीलता, संवाद पर भारी पड़ता अपराध –डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार आज समाज जिस दौर से गुजर रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। हाल के दिनों में सामने आई अनेक घटनाएँ मन को झकझोर कर रख देती हैं। कहीं प्रेम संबंधों के नाम पर हत्या हो रही है, कहीं विवाह से असहमति के कारण किसी की जान ले ली जाती है, तो कहीं छोटी-सी बात पर हिंसा का विस्फोट हो जाता है। अभी हाल ही में लोकल ट्रेन में हुई एक घटना ने भी सोचने पर मजबूर कर दिया। बारिश के कारण खिड़की खुली थी। एक यात्री ने दूसरे से केवल इतना कहा कि, "कृपया खिड़की बंद कर दीजिए।" मामूली-सी बात पर विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट तक की नौबत आ गई और एक व्यक्ति की जान चली गई। प्रश्न यह है कि आखिर हम इतने असहिष्णु कैसे हो गए कि एक साधारण अनुरोध भी हमें क्रोधित कर देता है? लोनावला की दुखद घटना हो या मसूरी का हत्याकांड—ये केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज के सामने खड़े गंभीर प्रश्न हैं। आखिर हमारी युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है? क्या कारण है कि असहमति, असफलता, अस्वीकृति या मतभेद को स्वीकार करने की क्षमता लगातार कम होती जा...