माटी में लोट-लोटकर.....!(कविता)
माटी में लोट-लोटकर.....!(कविता) रोक थी पहले कभी.....! समंदर पार करने की.... भृकुटि लाल हो जाती सभी की, ऐसी बात और हरकतों पर.... दिन बिसार दिए गए वे अब.... पूछता है हर कोई यही....! कि तुम समुंदर पार करोगे कब.... बस अर्थ की चिंता....! सताती है यहाँ सभी को... प्रेम की भाषा सुनो, नहीं सुहाती है किसी को... समंदर पार की गाथा....! सुहाती है....हर किसी को... हर आस पूरी होगी वहीं, बात यही रास आती है अब गाँव-देश में हर किसी को... सुना है कि निकाले गए थे....! सब रतन समंदर को मथकर.... जाने क्यों सबको लगता है ऐसा.... कि छिटके हुए हैं रतन...सब यही... दूरजाकर...कहीं उस पार समंदर... शायद....मेरे भारत को छोड़कर... मैंने भी....मशहूर होने और.... कुछ रतन....पाने की जिद में.... बहुत मन से समंदर पार किया... इसी बहाने से....! खुद अपना और अपनों का... सपना साकार किया....पर... समझ में देर से आया मेरे मित्रों कि....माँ-बाप और गाँव-देश पर...! मैंने तो अत्याचार किया...क्योंकि... जो बखान करते थे लोग....! समंदर पार की शुद्ध हवा-पानी का उसमें अभाव ही अभाव है.... बचपन की नादानी और शैतानी का मैंने नज़दीक से ...