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*परिवर्तन कल और आज...!*

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*परिवर्तन कल और आज...!* आजकल....अपने समाज में.... देखने को नहीं मिलती है... एक सिरे से.... सबको डाँटने वाली जमात... नहीं मिलती है.... हर किसी काम-काज में.... कुछ न कुछ टोकने वाली जमात.. पता नहीं ....शिक्षा का असर है... या फिर....बेरोजगारी का असर है  इस विकसित समाज में....अब... दिखती है बस एक नई जमात... जो उलझी हुई है.... खुद काँटों के ताज में.... अंतर नहीं मालूम है इनको.... कौआ - तोता - मैना.... चील और बाज़ में... रखना चाहते हैं ये.... अपना सब कुछ ही....! पिन और ओ टी पी के राज में... तमन्ना इस प्रकार की है इनकी... कि चुप करा देंगे दुनिया को.... अपनी ऊँची आवाज़ में... और क्या कहूँ इसके अलावा... क्या-क्या दिखता है.... इनके व्यवहार में....! कभी दिखते नहीं ये सभी... किसी भी लोक-लाज में.... खुश दिखाते हैं...खुद को... लोगों के सामने...हमेशा ही... चाहे कोढ़ में हों या हों खाज में.... अब कैसे कहूँ प्यारे....! जब कोई डाँटने वाला नहीं होगा घर-परिवार और समाज में.... सचमुच....तब ही विचार करेगी... यह युवा पीढ़ी.....नई पीढ़ी.... क्या परिवर्तन हुआ है...? कल और आज में.... क्या परिवर्तन ह...

दीपावली की पूर्व संध्या पर वीरभानपुर गांव में काव्य गोष्ठी का आयोजन

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दीपावली की पूर्व संध्या पर वीरभानपुर गांव में काव्य गोष्ठी का आयोजन जौनपुर। बदलापुर तहसील अंतर्गत स्थित वीरभानपुर गांव निवासी प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र के आवास "केशव कुंज" पर दीपावली की पूर्व संध्या पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस काव्य गोष्ठी में जनपद के अनेक वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार शामिल हुए। करीब 2 घंटे तक चली काव्य गोष्ठी में सभी ने अपनी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। डॉ कृपाशंकर मिश्र (नारीपुर , सुजानगंज ), डॉ प्रेम शंकर द्विवेदी (भास्कर ), शिवानन्द चौबे (प्राध्यापक गौरीशंकर संस्कृत महाविद्यालय सुजानगंज ),अमरनाथ सिंह (मोही )ऊंच गांव सुजानगंज, वरिष्ठ पत्रकार शिवपूजन पांडे तथा प्रोफेसर विजयनाथ मिश्र ने वीर,श्रृंगार और हास्य रस से जुड़ी कविताओं का वाचन किया। कविताओं के माध्यम से ही देशवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं दी गई। प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र मीरा भायंदर शहर में रहते हैं। कृष्णा क्लासेस का संचालक होने के साथ-साथ वे महर्षि दयानन्द महाविद्यालय में भैतिक विज्ञान के प्राध्यापक भी हैं।

" मन के दीप जलाओ "*-------डॉ. वेदपति मिश्र*

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" मन के दीप जलाओ " *-------डॉ. वेदपति मिश्र* दूर करो , प्रभु ! अंधियारा, मानव-जीवन , तम से हारा ।  रोजी से  रोटी    ग़ायब है,  सीपी से   मोती  सारा ॥ राम- महल में डाकू सक्रिय, आम-आदमी किसे  पुकारे ? हल्कू की है वही कहानी  ! आख़िर किसकी ओर निहारे ॥ पर्व-अर्थ क्या दीप जलाना ? या फिर भूंखा पाये खाना  ? माँ वसुधा  की व्यथा यही है- कृषकों को है लोन चुकाना ॥ आम-आदमी  या  संन्यासी , भजता रहता मथुरा , काशी । बाबा को    आती है ख़ासी , करें उँधारी,   लगती फाँसी॥ बेटी  घर में   हुई  सयानी , शादी की  है बात चलानी । कान  चबाती  दादी-नानी ! दीप जलेगा, क्या फिर पानी? दूल्हा है   बाज़ार  बिकाऊ , दाम करोड़ों, कहाँ से लाऊँ? दाँतों को यदि तोड़, बेंच दूँ  फिर मैं  कैसे पीऊँ - खाऊँ ? छोटू  की   तो शर्ट    फटी  है , कालिज-फी , भी नहीं पटी है । फिर कल कैसे मने दीवाली , सजे दीप-पूजन की  थाली ॥ सम्बन्धों  की...

*परिवर्तन कल और आज...!**जितेन्द्र कुमार दुबे*

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*परिवर्तन कल और आज...!* *जितेन्द्र कुमार दुबे* आजकल....अपने समाज में.... देखने को नहीं मिलती है... एक सिरे से.... सबको डाँटने वाली जमात... नहीं मिलती है.... हर किसी काम-काज में.... कुछ न कुछ टोकने वाली जमात.. पता नहीं ....शिक्षा का असर है... या फिर....बेरोजगारी का असर है  इस विकसित समाज में....अब... दिखती है बस एक नई जमात... जो उलझी हुई है.... खुद काँटों के ताज में.... अंतर नहीं मालूम है इनको.... कौआ - तोता - मैना.... चील और बाज़ में... रखना चाहते हैं ये.... अपना सब कुछ ही....! पिन और ओ टी पी के राज में... तमन्ना इस प्रकार की है इनकी... कि चुप करा देंगे दुनिया को.... अपनी ऊँची आवाज़ में... और क्या कहूँ इसके अलावा... क्या-क्या दिखता है.... इनके व्यवहार में....! कभी दिखते नहीं ये सभी... किसी भी लोक-लाज में.... खुश दिखाते हैं...खुद को... लोगों के सामने...हमेशा ही... चाहे कोढ़ में हों या हों खाज में.... अब कैसे कहूँ प्यारे....! जब कोई डाँटने वाला नहीं होगा घर-परिवार और समाज में.... सचमुच....तब ही विचार करेगी... यह युवा पीढ़ी.....नई पीढ़ी.... क्या परिवर्तन हुआ है...? कल और आज ...

नेंह से एक दिया देशवा के किसान जवान के नाउं जरावा।।

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*नेंह से एक दिया देशवा के किसान जवान के नाउं जरावा।।* *----छंदकार एडवोकेट गिरीश श्रीवास्तव*  बालक बृद्ध भरे मनमोद विनोद करैइ मिलि के नर नारी।।  छाई खुशी घर बाहर भीतर नाचत गावत दैइ दैइ तारी।।  छाड़ि अकास धरा तरई मुसुकात गिरीश झरैइ उजियारी।।  राति अमावस क तम भागैइ भाग सुभाग मनावा देवारी।। झालर छाड़ि विदेशी स्वदेशी दिया मटिया क सबैइ अपनावा।।  साफ सफाई करा उर क सुर से सुर मेलि के मंत्र जगावा।।  आवा गिरीश सबैइ मिलि के अन्हियार धरा कैइ दूर भगावा।।  नेंह से एक दिया देशवा के किसान जवान के नाउं जरावा।। हीरा बिकैइ भल मोती बिकैइ सोनवा चनियां पैइसा कैइ खेला।।  लाई मिठाई ल बर्तन ल लक्ष्मी अउ गनेस गिरीश क चेला।।  भीड़ जुरी देहि मोर छोलाइग शोर अपार बा रेली क रेला।। लागि बजार बा भल गुलज़ार बा देखा धना धनतेरस मेला।। साफ सफाई करा घर बाहर बेचा कबाड़ घरे क पुरानी।।  थाली कटोरी गिलास ल चम्मच लूट मची बा दुकानी दुकानी।।  देखा सुमेरा निहोर गिरीश बजारे में घूमैइ दूनौ परानी।। गांऊ क मेला उमा घर बैठि करैइ अपने घर क निगरानी।। झारत पोछत चउक पूर...

राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज विकास नगर में हुआ - छात्र वंदन गुरु अभिनन्दन

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राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज विकास नगर में हुआ - छात्र वंदन गुरु अभिनन्दन  लखनऊ  भारत विकास परिषद अवध प्रांत की ओर से जीजीआईसी विकास नगर संस्था के पदाधिकारियों द्वारा प्रधानाचार्य कुसुम वर्मा को सम्मानित किया गया।क्षेत्रीय संयुक्त महासचिव सच्चिदानंद, अध्यक्ष एडवोकेट वाई के गुप्ता, कोषाध्यक्ष कविता सिंह गुप्ता, गतिविधि संयोजक संस्कार जी. एन. टंडन, संस्कार संयोजिका मनोरमा उपाध्याय और संयोजक वीना गुप्ता के नेतृत्व में पांच छात्राओं का उपहार देकर वंदन किया गया । गीत गुरू मेरी पूजा गुरू गोविन्द गुरू मेरा परब्रह्म गुरू परमेश्वर... गाकर छात्राओं द्वारा उपहार देकर व अपने गुरू शिक्षिकाओं का चरण स्पर्श कर अभिनंदन किया गया । कार्यक्रम में मंच संचालन प्रवक्ता हिन्दी सीमा वर्मा ने किया । स्टाफ में कंचन लता सिंह, मीनाक्षी दुबे, शबनम, अनु गंगवार, अपर्णा जौहरी , पूनम नागर, स्मिता पटेल, बबिता रानी वर्मा, मनीषा सक्सेना , प्रियंका सिंह, रश्मि मिश्रा , मीनाक्षी श्रीवास्तव, गीतांजलि पांडेय सहित सीमा तथा प्रीति उपस्थित रहे।अंत में प्रधानाचार्य कुसुम वर्मा ने सबका धन्यवाद ज...

*जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।।**-------- मुक्तक कार गिरीश कुमार गिरीश*

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*जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।।* *-------- मुक्तक कार गिरीश कुमार गिरीश* जरा ठहरो तुम्हारे रूप का मै आचमन कर लूँ।।  सुमन अर्पित करूँ श्रद्धा से झुक कर मै नमन् कर लूँ।। धधकती रहती तन मन में मेरे जो प्रेम की ज्वाला-  तुम्हारे प्रेम के वर्षा विना कैसे समन कर लूँ।। धड़कता ही नहीं दिल इस में स्पन्दन नहीं होता न आओ याद तुम ऐसा कोई भी छन नहीं होता।।  सुकूँ और चैन मिलता है तुम्हारे साथ होने से  तुम्हारे पास से जाने का जानम मन नहीं होता। ये हरियाली कहाँ होती अगर सावन नहीं होता।।  अगर सांसें नहीं होती तो ये जीवन नहीं होता।।  ये निधिवन और वृन्दावन की चर्चा तक नहीं होती- न होती राधिका घनश्याम तो मधुवन नहीं होता।। रवानी गर नहीं होती तो ये कल कल नहीं होता।।  अगर गंगा नहीं होती तो अमृत जल नहीं होता।।  समन्दर से अगर मिलने की आतुरता नहीं होती- हृदय ब्याकुल नहीं होता कभी हलचल नहीं होता।। ----------9919667469