*कर्मफल* *-----+- सुखराम शर्मा सागर*
*कर्मफल* *-----+- सुखराम शर्मा सागर* कर्मों को अपने नहीं समझते दोष किसी औरो को क्यों देते प्रतिफल बनेगा वहीं मिलेगा किया जो हमने अपने ही मनसे। अच्छा बुरा करने से तो पहले मन की बातें नाप जो लेते कठिन डगर से वे भी निकलते रिश्ते को अपने बनाकर चलते। किया जो हमने अपने ही मन से। चारों हमारे दुश्मन है साथी तीनों की कीमत नहीं समझते कानन में पेड़ों की गिनती नहीं है स्वाद की कीमत जुबा से परखे। किया जो हमने अपने ही मन से। सभ्य समाज को अपना बनाकर सुख-दुख में साथ निभाकर मोती की कीमत वही समझते सागर की गहराई नाप जो सकते। किया जो हमने अपने ही मन से। जनकविसुखराम शर्मा सागर सलोन रायबरेली 91 25630 310 उत्तर प्रदेश