" चंदा मामा....गंदा मामा.....!"(कविता)
" चंदा मामा....गंदा मामा.....!"(कविता) चंदा मामा....चंदा मामा.... तुम तो हो....बस एक.... गन्दा मामा....गन्दा मामा.... दाग सैकड़ों तुम पर मामा, दुनिया भर के देखात...फिर भी... जाने कैसे लोग कहत हैं....! हर सुन्दरता यहि जग के, तोहरे आगे बेबस शरमात.... हम तो जानित....बस एकहि बात.. बस वशीभूत होय प्रेम के....! ऐसो किस्सा....है लिख्यो जात.... शीतलता तुम्हरी सगरी जग बांचै.... पर....हम शीतल तोहके तब मानी.. जब तू पहिना कबहूँ स्वेटर जर्सी, अउर लगावा काँपत-काँपत... रोज रज़ाई-कम्बल कै अर्ज़ी.... सच माना ....ठंडी तोहरे अंदर.... दिखत नहीं है कतहूँ....! कबहूँ नाही होता तू तो..... अस्पताल मा भर्ती.... सच माना तो मामू.... तुम हो मनई एक फ़र्ज़ी.... करत दिखत हौ तू हरदम, हरक़त मनमानी..... हमहूँ तोहार ई लीला मामू....! खूब मज़े से जानी.... अब गाँव-देश मा सबै कहत है.... कि तुम हौ बड़े ही नक्शेबाज़.... फिर...तुम ही बताओ मामू....! कैसे न कही हमहूँ तोहके.... मामा दगाबाज....मामा दगाबाज... अउर सुनो....मेरे गंदे मामा....! तुम्हरी गंदी आदत के कारण ही.... एक समस्या दिखती है बड़ी विकट.. दिन में....मोरे प...