हम भारतीय हैं, पर भारत में ही क्यों नहीं?
हम भारतीय हैं, पर भारत में ही क्यों नहीं? एक गहरा सत्य है जो हम सबने महसूस किया है। जब हम विदेश की धरती पर होते हैं और कोई पूछता है - Where are you from? तो हमारा जवाब एक ही होता है - We are from India. हम कभी नहीं कहते कि हम महाराष्ट्र से हैं, हम UP के भैया हैं, हम बिहारी हैं, हम मद्रासी हैं, हम गुजराती हैं। वहाँ हमारी पहचान सिर्फ एक है - भारतीय। और दुनिया भी हमें उसी एक नाम से पहचानती है - Indian. फिर सवाल उठता है, वही भारतीय जब अपने ही देश में लौटता है तो उसे टुकड़ों में क्यों बांट दिया जाता है? यहाँ आते ही हम मराठी हो जाते हैं, हिंदी-भाषी हो जाते हैं, उत्तर भारतीय हो जाते हैं, दक्षिण भारतीय हो जाते हैं। यहाँ हम ब्राह्मण, ठाकुर, दलित, सवर्ण, पिछड़ा हो जाते हैं। हिन्दू-मुसलमान हो जाते हैं। ये बंटवारा किसने किया? सच तो यह है कि यह बंटवारा आज का नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था ने काम के आधार पर जो वर्गीकरण किया था, वह धीरे-धीरे जन्म के बंधन में जकड़ गया। फिर मुगल आए, उन्होंने मजहब के नाम पर पहचाना। फिर अंग्रेज आए, उन्होंने तो इस फूट को ही शासन ...