एक लाश चल रही, एक लाश कंधे पर लेकर–डॉ रमाकांत क्षितिज, वरिष्ठ साहित्यकार
एक लाश चल रही, एक लाश कंधे पर लेकर –डॉ रमाकांत क्षितिज, वरिष्ठ साहित्यकार कभी पढ़ी थी कविता इलाहबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर इस बार देखा जो पथ अब बन गई नई सड़क उस पर एक लाश चल रही एक लाश कंधे पर लेकर दोनों में फ़र्क करना बड़ा मुश्किल था कौन चलती फिरती लाश कौन सिर्फ और सिर्फ लाश ज़्यादा फ़र्क भी ना था ना काया में ना कपड़ों में एक मर गई थी एक जीते जी मर रही थी हमनें भी देखा सड़क पर एक लाश चल रही थी एक लाश कंधे पर लेकर एक लाश को कोई जानकारी नही उसे कौन कहाँ ले जा रहा एक जीवित लाश को भी नही पता सिस्टम कहाँ से कहाँ जा रहा तरक्की क्या होती है जीडीपी क्या होती है प्रति व्यक्ति आय क्या होती है डेथ का भी सर्टिफिकेट होता है कहाँ बनता है कैसे बनता है उसे तो बस पता है भूख बेबसी लाचारी स्वयं को जीवित रखने की ज़िम्मेदारी उसकी तरक्की तो भूख तक का ही सफर तय कर पाई है उसके लिए इंसानी सभ्यता क...