*भारत की प्रगति में योगदान देने वाला आज भी परेशान है*
*भारत की प्रगति में योगदान देने वाला आज भी परेशान है*
आजादी के पहले राजतंत्र था तब आमजन बहुत सताये जाते थे।राजाओं से कम जमींदारों से अधिक।एक कहावत है न चाय से अधिक केतली गर्म।उस खंडकाल में ऐसा ही था। जमींदार लोग जनता के साथ अत्याचार करते थे।इसी अत्याचार को खत्म कर आम आदमियों के जीवन में भी खुशहाली आये।इसके लिए भारत के नौजवानों ने क्रांति का विगुल बजा दिया।राजशाही को खत्म करने में अनेकों ने बलिदान दिया।जिसके चलते राजतंत्र खत्म हुआ और प्रजातंत्र स्थापित हुआ। लोगों में खुशी का संचार हुआ। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात।आम जनता अपना खून बहाती रही। कमरतोड़ मेहनत करती रही।देश का उत्थान हो इसलिए टैक्स भी देती रही।मगर सत्तासीन लोग अपने हर एशो-आराम के लिए काम पर लगे रहे।एक तरफ जनता जानवरों की तरह भोजन कर रही थी तो दूसरी तरफ कथित जनसेवक हर वो ऐशो आराम कर रहे थे।जो एक राजा करता है।विलासिता की सारी हदों को तोड़ रहे थे। कपड़े भारत में न बनते थे उनके न धुलते थे।सरकारी विमान से जहांपनाह सेविंग (दाढ़ी)बनवाने के लिए विदेश जाते थे।अब आप समझ चुके होंगे कि वो जनसेवक कौन थे।अब जरा सोंचिए जिस देश में देशवासी जानवरों वाला भोजन करते थे।उसी देश का जनसेवक देशभक्त सपरिवार संसार के वो सारे सुख भोग रहा था जो एक राजा के लिए भी सम्भव नहीं था।
आजादी के ७८वर्ष हो गये।आम आदमी की हालत कमोबेश आज भी वैसी की वैसी ही है।आम आदमी आज भी मूलभूत सुविधाओं से दूर है।न ढंग से परिवहन की व्यवस्था है न बिजली पानी और सड़क की व्यवस्था है।आम आदमी यह सोंचकर मेहनत करते जा रहा कि अगले बरस जरूर समस्या खत्म हो जायेगी।मगर होता उसके उलट है। समस्या और विकराल रूप लेकर पहाड़ सरीखी हो जाती है। वहीं आम आदमी की मेहनत का सुख सब जनसेवक ले रहे हैं।जनता अपनी जान हथेली पर रखकर प्रतिदिन मां बहन की गाली खाते हुए देश और अपनी प्रगति में लगा है।न उसके सुख की चिन्ता किसी जनसेवक को है।न ही उसकी मौत का दुख।उल्टे यही आम आदमी उन्हें सारे सुख देने के लिए,उनके लिए लड़ता झगड़ता और अपनी जान भी दे रहा है। जानवरों से बद्तर जिन्दगी जीने को विवश है। फिर भी जीवटता देखिए।रोज मर मर के जीते हुए भी मुस्कुरा देता है।
आम जन की सुध सरकारें लेने का बड़ा दम्भ तो भरती हैं मगर लेती नहीं हैं। मुम्बई महानगर में आम जन की बड़ी छिछालेदर है।मेहनत तो वो कमर तोड़ कर रहा है।देश की प्रगति में सबसे अधिक योगदान आम आदमी ही दे रहा है। फिर भी हर सुविधाओं से महरूम है।विरार से लोकल ट्रेन में यात्रा करना नाकों चने चबाने के बराबर है।आदमी के ऊपर आदमी चढ़के नित यात्रा कर रहा है।उसी में कई बार लोग दुर्घटना के शिकार हो मर जाते हैं।उनका परिवार अनाथ हो जाता है।उनके इस बलिदान की कोई कीमत नहीं होती है।उन्हें शहीद का भी दर्जा नहीं मिलता।क्योंकि आम आदमी है इसलिए।ढंग का मुआवजा भी नसीब नहीं होता।उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं होती। क्योंकि वह खास आदमी नहीं है।
ए सब हो रहा है सरकार की गलत नीतियों के चलते।आटो टैक्सी में पैसेंजर की एक निश्चित सीमा है।उससे अधिक पैसेंजर होने पर फाइन द्वारा वसूली की जाती है।तो लोकल ट्रेन में।ओवर लोड पैसेंजर क्यों ढोये जा रहे।सरकारी पब्लिक वाहन में ओवरलोड पसेंजर क्यों? उसमें भी आटो टैक्सी वाला नियम क्यों नहीं।क्यों पर्याप्त सुविधा से आज भी जनता महरूम है।और नेतागण के लिए वही व्यवस्था सुचारू रूप से क्यों है।आम जन के लिए सरकार कब इमानदारी से चिंतित होगी।आम आदमी कब अपनी मेहनत का फल पायेगा।आम आदमी को बहुत कुछ नहीं चाहिए।उसको बस समुचित विजली पानी सड़क चाहिए।और काम पर जाने के लिए समुचित परिवहन की सुविधा। जिससे वह आराम से अपने काम पर आ जा सके।काम पर छूटने के बाद उसको भी आरामदायक यात्रा का सुख चाहिए।विजली पानी की समुचित व्यवस्था चाहिए।और कुछ नहीं चाहिए।बाकी वो सबकुछ अपनी मेहनत से प्राप्त कर लेगा।जिस दिन उल्लिखित समस्या से आम जन निवृत्त होगा।उस दिन सच में जनतंत्र दिखेगा।अभी तो बस कहने के लिए जनतंत्र है।बाकी राजतंत्र ही अब भी काम कर रहा है।जन तो आज भी त्रस्त है।आज ७७वीं गणतंत्र मनाई जाने वाली है।उसकी तैयारी जोर शोर से हो रही।जनता को लच्छेदार भाषणों से लालीपाप दिया जायेगा।जनता भी खुश होकर ताली बजायेगी।और पुनः जललालत भरी जिंदगी जीने को विवश होगी।अपनी लाश को अपने कंधे पर ढोते हुए एक दिन इसी दुनियां में गुम हो जायेगी।
पं.जमदग्निपुरी
धन्यवाद भाई
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